Tuesday, 19 July 2016

कपिलमुनि अवतार -- डाॅ कृष्ण पाल त्रिपाठी

           भगवान विष्णु के चौबीस अवतारों मे भगवान कपिलमुनि के अवतार की गणना पञ्चम स्थान पर की गयी है।इस अवतार मे वे सिद्धों के स्वामी के रूप मे प्रकट हुए और आसुरि नामक ब्राह्मण को सांख्यशास्त्र का उपदेश दिया ---
   पञ्चमः कपिलो नाम सिद्धेशः कालविप्लुतम्।
   प्रोवाचासुरये सांख्यं तत्त्वग्रामविनिर्णयम्।।
            श्रीमद्भभागवत महापुराण के अनुसार भगवान कपिल जी साक्षात् भगवान हैं।वे प्रकृति और पुरुष के भी स्वामी और समस्त प्राणियों के आत्मा हैं।उनके अतिरिक्त अन्य किसी का आश्रय ग्रहण करने पर मृत्यु रूपी महाभय से छुटकारा पाना संभव नहीं है।
           सृष्टि के आरम्भ मे भगवान ब्रह्मा जी ने अपने मानस-पुत्र कर्दम को प्रजावृद्धि करने का आदेश दिया।कर्दम जी प्रजावृद्धि का उपाय प्राप्त करने के लिए बिन्दुसरतीर्थ मे तप करने लगे।दस सहस्र वर्षों के बाद भगवान श्रीहरि ने उन्हें दर्शन दिया।मुनि ने स्तुति करने के बाद कहा -- मुझे जगत्पिता ने प्रजावृद्धि का आदेश दिया है।अतः आप किसी गुणवती कन्या से मेरा विवाह करवा दें।भगवान ने कहा -- स्वायम्भुव मनु शीघ्र ही अपनी कन्या देवहूति के साथ तुम्हारे पास आयेंगे।वह कन्या तुम्हारे लिए सर्वथा उचित है।उसी के साथ विवाह कर लो।वह सृष्टि-संवर्धन मे पूर्ण सहयोग देगी।कालान्तर मे मै भी अपने अंश-कला रूप से तुम्हारे वीर्य द्वारा देवहूति के गर्भ से अवतार लूँगा।इस प्रकार वरदान देकर श्रीहरि अन्तर्धान हो गये।
            बाद मे स्वायम्भुव मनु अपनी पुत्री देवहूति के साथ महर्षि कर्दम के आश्रम पर आये और उनके साथ देवहूति का विवाह कर दिया।विवाह के तत्काल बाद कर्दम जी पुनः तपस्या करने लगे।पत्नी देवहूति जी उनकी सेवा मे जुट गयीं।एक दिन महर्षि ने कहा -- तुमने मेरी सेवा मे अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया है।अतः मै भी तुम्हें इसका प्रतिदान देना चाहता हूँ।इतना कहकर उन्होंने अपनी योगमाया से एक दिव्य विमान प्रकट किया ; जो सर्वत्रगामी और सर्वविध सुख-सुविधा से युक्त था।
           महर्षि ने प्रेमपूर्वक अपनी पत्नी को उस विमान पर बैठाया और दीर्घकाल तक बिहार किया।वहाँ से लौटकर मुनि ने अपने स्वरूप के नौ विभाग कर अपनी पत्नी के गर्भ मे वीर्य स्थापित किया।इससे देवहूति के गर्भ से एक साथ नौ कन्यायें उत्पन्न हुईं।इसके बाद महर्षि ने तप करने के लिए वनगमन करने की इच्छा प्रकट की।तब देवहूति ने निवेदन किया -- भगवन ! आपने जो प्रतिज्ञा की थी ; उसे तो निभा दिया।फिर भी मै आपकी शरणागत हूँ।अतः आप मुझे अभयदान दीजिए।भविष्य मे इन कन्याओं के लिए योग्य वर खोजने तथा मेरे जन्म-मरण रूपी शोक को दूर करने के लिए भी कोई सहारा होना चाहिए।
          अपनी पत्नी की विनम्र वाणी को सुनकर कर्दम जी बोले -- तुम अपने विषय मे इस प्रकार खेद मत करो।तुम्हारे गर्भ मे अविनाशी प्रभु शीघ्र ही पधारेंगे।तुम श्रद्धा पूर्वक भगवान का भजन करो।इसे सुनकर देवहूति जी भगवान पुरुषोत्तम की आराधना मे संलग्न हो गयीं।कालान्तर मे भगवान विष्णु जी कर्दम ऋषि के वीर्य का आश्रय लेकर देवहूति के गर्भ से प्रकट हुए।उसी समय ब्रह्मा जी आये और कर्दम ऋषि से बोले -- हे पुत्र ! वे आदिपुरुष श्रीनारायण ही अपनी योगमाया से कपिल मुनि के रूप मे अवतरित हुए हैं।जब कर्दम ऋषि को ज्ञात हुआ कि मेरे यहाँ श्रीहरि ने ही अवतार लिया है ; तब उन्होंने उनकी विधिवत स्तुति की।उसके बाद उनकी आज्ञा लेकर कर्दम जी तप करने के लिए वन को चले गये।
           इसके बाद कपिलमुनि भी अपनी माता के साथ बिन्दुसर तीर्थ चले गये।वहीं उन्होंने अपनी माता को सांख्यशास्त्र का उपदेश किया।साथ ही भक्ति-विस्तार एवं योग का भी वर्णन किया।बाद मे अपनी माता से आज्ञा लेकर कपिल जी ईशानकोण की ओर चले गये।वहाँ समुद्र ने उनका पूजन कर उन्हें स्थान प्रदान किया।वे तीनों लोकों को शान्ति प्रदान करने के लिए वहीं तपस्या करने लगे।
          कुछ दिनो बाद राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया किन्तु इन्द्र ने उस घोड़े को चुराकर कपिल जी के पास बाँध दिया।राजा सगर के साठ हजार पुत्र पृथ्वी को खोदते हुए जब कपिल मुनि के पास पहुँचे तो देखा कि अश्व वहीं बँधा था।सगरपुत्रों ने मुनि को चोर मानकर घोर अपशब्द कहा।मुनिवर को क्रोध आ गया।उन्होंने अपने नेत्र की ज्वाला से सबको भस्म कर दिया।
          इस प्रकार कपिलमुनि साक्षात् श्रीहरि के अवतार थे।उन्होंने संसार मे तपस्या के उच्च आदर्श की स्थापना करने और विश्व का कल्याण करने के लिए ही अवतार लिया था।उन्होंने सांख्यदर्शन के द्वारा सभी को मोक्ष का मार्ग दिखाया।आज भी मकर संक्रान्ति के दिन असंख्य लोग गंगासागर मे कपिलमुनि के आश्रम का दर्शन करने के लिए जाते हैं।

Monday, 18 July 2016

भगवान यज्ञावतार -- डाॅ कृष्ण पाल त्रिपाठी

           भगवान विष्णु के चौबीस अवतारों मे भगवान यज्ञ के अवतार को सप्तम स्थान पर परिगणित किया गया है --  
   ततः सप्तम आकूत्यां रुचेर्यज्ञोऽभ्यजायत।
   स यामाद्यैः सुरगणैरपात्स्वायम्भुवान्तरम्।।
           भगवान यज्ञ का अवतरण  स्वायम्भुव मन्वन्तर मे हुआ था।स्वायम्भुव मनु की पुत्री का नाम आकूति था।उनका विवाह प्रजापति रुचि के साथ हुआ।बाद मे इन्हीं आकूति के गर्भ से आदिपुरुष श्रीहरि जी यज्ञ रूप मे अवतरित हुए।इन्होंने ही उस समय यज्ञ का प्रवर्तन किया।इसलिए वे यज्ञ के नाम से प्रसिद्ध हुए।
          स्वायम्भुव मनु ने दीर्घकाल तक शासन किया।बाद मे समस्त भोगों एवं कामनाओं से विरक्त होकर अपनी पत्नी  शतरूपा सहित वन की ओर चल पड़े।आगे चलकर वे सुनन्दा नदी के तट पर तपस्या करने लगे।उन्होंने एक पैर से खड़े होकर सौ वर्षों तक कठोर तप किया।एक बार वे उपनिषत् स्वरूप श्रुति का पाठ कर रहे थे।उस समय कुछ राक्षसों और असुरों ने समझा कि वे नींद मे बड़बड़ा रहे हैं।अतः उन्हें खा डालने के लिए उन पर टूट पड़े।
             इस घटना को जब भगवान यज्ञपुरुष ने देखा तब वे अपने पुत्रों के साथ स्वायम्भुव जी की रक्षा के लिए दौड़ पड़े।उन्होंने असुरों को पराजित कर खदेड़ दिया।इस प्रकार मनु जी की रक्षा हुई।इसे देखकर देवगण बहुत प्रसन्न हुए।उन्होंने यज्ञ भगवान को इन्द्र पद पर अभिषिक्त कर दिया।वे दीर्घकाल तक उस गरिमामय पद को सुशोभित करते रहे।
          भगवान यज्ञ का विवाह दक्षिणा नामक गुणवती कन्या के साथ हुआ।बाद मे उनके बारह पुत्र हुए ; जो स्वायम्भुव मन्वन्तर मे " याम " ( सुयम ) नामक द्वादश देवता के नाम से प्रसिद्ध हुए।भगवान यज्ञ सर्वसमर्थ एवं अत्यन्त दयालु थे।उन्होंने तीनों लोकों के बड़े-बड़े संकटों को दूर किया था।इसीलिए स्वायम्भुव जी उन्हें " हरि " नाम से पुकारते थे।

नर-नारायण अवतार-- डाॅ कृष्ण पाल त्रिपाठी

           भगवान विष्णु के चौबीस अवतारों मे भगवान नर-नारायण अवतार की गणना चतुर्थ स्थान पर की गयी है।श्रीमद्भागवत महापुराण ( 1/3/9 ) के अनुसार सृष्टि के आरम्भ मे भगवान वासुदेव श्रीहरि ने धर्म की पत्नी मूर्ति के गर्भ से नर-नारायण के रूप मे अवतार ग्रहण किया था।इस अवतार मे उन्होंने ऋषि बनकर मन और इन्द्रियों का सर्वथा संयम करके बहुत  कठोर तपस्या की थी ---
   तुर्ये धर्मकलासर्गे नरनारायणावृषी।
   भूत्वाऽऽत्मोपशमोपेतमकरोद् दुश्चरं तपः।।
           पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान नर-नारायण जी प्रकट होने के तत्काल बाद तपस्या करने के लिए बदरिकाश्रम चले गये।वहाँ वे गन्धमादन पर्वत पर एक वटवृक्ष के नीचे तपस्या करने लगे।उन्होंने एक सहस्र वर्षों तक कठोर तपस्या की।उनकी तपस्या को देखकर देवराज इन्द्र सशंकित हो गये।वे उन तपस्वी ऋषियों के पास जाकर बोले -- मै तुम दोनो की तपस्या से पूर्ण सन्तुष्ट हूँ।अब आप मनोवाँछित वर माँगिये।उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया।इसके बाद इन्द्र ने उनकी तपस्या भंग करने के लिए अनेक प्राकृतिक प्रकोप प्रस्तुत किये किन्तु वे दोनो तनिक भी विचलित नहीं हुए।
           इतने पर भी इन्द्र शान्त नहीं हुए।उन्होंने ऋषिद्वय की तपस्या भंग करने के लिए कामदेव सहित अनेक अप्सराओं को भेजा।उन सबने नर-नारायण को वशीभूत करने के लिए अनेक उपाय किये।अन्त मे नर-नारायण की समाधि भंग हुई।फिर भी वे क्रुद्ध नहीं हुए।उन्होंने कामदेव आदि से कहा -- आप लोग स्वर्ग से आये हुए हैं।इसलिए हमारे अतिथि हैं।हम आपका यथोचित सत्कार करेंगे।इतना कहकर उन्होंने अपनी माया से एक विचित्र दृश्य उपस्थित किया ; जिसमे लक्ष्मी सदृश अनेक देवियाँ भगवान नर-नारायण की सेवा कर रही थीं।इसे देखकर कामादि बहुत लज्जित हुएऔर ऋषिद्वय की स्तुति करने लगे।भगवान नर-नारायण प्रसन्न होकर बोले -- तुम लोग इन स्त्रियों मे से किसी एक को अपने साथ ले जा सकते हो।उन लोगों ने उर्वशी को ले लिया।बाद मे उसे इन्द्र को समर्पित कर सम्पूर्ण वृत्तान्त कह सुनाया।इन्द्र भी आश्चर्य चकित होकर शान्त हो गये।
            एक बार नर-नारायण तप कर रहे थे।उसी समय प्रजापति दक्ष के यज्ञ को नष्ट करने के लिए भगवान रुद्र ने अपना त्रिशूल चलाया।वह त्रिशूल यज्ञ का विध्वंश करते हुए तपःरत भगवान नारायण के वक्ष पर आ लगा।नारायण ने भयानक हुंकार भरी ; जिससे वह त्रिशूल रुद्र जी के हाथ मे वापस चला गया।अब तो रुद्र जी का क्रोध अपने चरम पर पहुँच गया।वे नर-नारायण पर आक्रमण कर बैठे।दोनों पक्षों मे भयानक युद्ध छिड़ गया।उस समय ऐसा प्रतीत होता था ; मानो आज ही विश्व-विनाश हो जायेगा।इसे देखकर ब्रह्मा जी आये और दोनो को समझा-बुझाकर शान्त किया।रुद्र जी के चले जाने पर नर-नारायण जी पुनः तपस्या मे संलग्न हो गये।
           नर-नारायण जो सर्वसमर्थ अवतार थे।उन्हें तप करके शक्ति अर्जित करने की आवश्यकता नहीं थी।वे तो संसार मे तप के आदर्श को स्थापित करने के तप कर रहे थे।उनका अवतार ही तप करने के लिए हुआ था।उन्होंने अनेक लीलायें की थीं।वे आज भो बदरिकाश्रम मे तप करते हुए विश्व कल्याण मे संलग्न हैं।

Sunday, 17 July 2016

नारद अवतार -- डाॅ कृष्ण पाल त्रिपाठी

          भगवान विष्णु के चौबीस अवतारों मे देवर्षि नारद अवतार की गणना तृतीय स्थान पर की गयी है।श्रीमद्भागवत महापुराण ( 1/3/8 ) के अनुसार ऋषियों की सृष्टि मे भगवान ने देवर्षि नारद के रूप मे तीसरा अवतार ग्रहण किया और सात्वत तन्त्र ( नारद पाञ्चरात्र ) का उपदेश दिया था।इस ग्रन्थ मे कर्म द्वारा कर्मबन्धन से मुक्ति का उपाय बताया गया है।नारद जी ब्रह्मा जी के मानस-पुत्र हैं।इसलिए वे सर्वत्र आवागमन करने मे सक्षम हैं।वे परम ज्ञानी एवं समस्त गोपनीय रहस्यों के ज्ञाता हैं।वे सूर्य की भाँति तीनों लोकों मे भ्रमण करने वाले और योगबल से प्राणवायु के समान सबके अन्दर रहकर अन्तःकरणों के साक्षी हैं।
          नारद जी के पूर्वजन्म का वृत्तान्त बहुत विचित्र एवं शिक्षाप्रद है।वे वेदवादी ब्राह्मणों की एक दासी के पुत्र थे।एक बार कुछ योगीगण एक स्थान पर वर्षा ऋतु मे चातुर्मास करने आये।उनकी सेवा मे उसी दासी-पुत्र को नियुक्त किया गया।उन्होंने अपनी सेवा से उन सबका मन मोह लिया।वह प्रतिदिन उन योगियों का जूठन खाया करता था।इससे उसके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो गये।वह प्रतिदिन उनके मुखारविन्द से निःसृत अमृतमयी कथायें सुनता रहता था।इससे भगवान के प्रति उसकी रुचि बढ़ती गयी।धीरे-धीरे उसके हृदय मे निर्मल भक्ति का प्रादुर्भाव हो गया।बाद मे उन महात्माओं ने उस बच्चे को गुह्यतम ज्ञान का उपदेश भी दिया ; जिससे वह बालक भगवान की माया के प्रभाव को भी जान गया।
             वे योगीगण जब वहाँ से चले गये तब वह बालक उसी बस्ती मे रहने लगा।दुर्भाग्यवश एक दिन उसकी माता को सर्प ने डस लिया।उसके बाद वह अनाथ बालक उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा।चलते-चलते उसका शरीर और इन्द्रियाँ शिथिल हो गयीं।मार्ग मे एक नदी मे स्नान कर वह एक पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गया।वह मन ही मन परमात्मा के दिव्य स्वरूप का ध्यान करने लगा।थोड़ी ही देर बाद उसके हृदय मे भगवान प्रकट हो गये।उस समय प्रेमभाव के अत्यन्त उद्रेक से उसका रोम-रोम पुलकित हो गया।हृदय अत्यन्त शान्त एवं शीतल हो गया।वह आनन्द-सिन्धु मे इस प्रकार निमग्न हो गया कि उसे किसी भी प्रकार का भान नहीं रह गया।कुछ देर बाद वह दृश्य लुप्त हो गया।अतः वह बेचैन होकर पुनः उसी दृश्य को देखने के लिए प्रयास करने लगा।परन्तु उसे सफलता नहीं मिली।
           इस प्रकार बारंबार प्रयत्न करते हुए उस बालक को देखकर भगवान ने कहा -- खेद है कि इस जन्म मे तुम मेरा दर्शन नहीं कर सकोगे।किन्तु इस शरीर का अन्त होने पर तुम मेरे पार्षद बनोगे।इसे सुनने के बाद वह बालक भगवान के रहस्यमय और मंगलमय मधुर नामों एवं लीलाओं का स्मरण करते हुए पृथ्वी पर विचरण करने लगा।कुछ दिनों बाद उसका पाञ्चभौतिक शरीर नष्ट हो गया।कल्पान्त मे जब भगवान नारायण जी जल मे शयन करने लगे तब उनके श्वास के साथ वह बालक भी भगवान के हृदय मे प्रविष्ट हो गया।एक सहस्र चतुर्युगी व्यतीत होने पर जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि-रचना की इच्छा की तब उनकी इन्द्रियों से मरीचि आदि ऋषियों के साथ वह बालक भी देवर्षि नारद के रूप मे प्रकट हो गया।
           नारद जी भगवान विष्णु के अनन्य भक्त हैं।वे सदा सर्वदा नारायण-नारायण का उच्चारण करते रहते हैं।वे वेद ; वेदान्त ; ज्योतिष ; संगीत आदि विषयों के आचार्य हैं ही किन्तु भक्ति के तो परमाचार्य हैं।इस क्षेत्र मे उनके बराबर न कोई हुआ है और न भविष्य मे हो होगा।नारद जी दया की साक्षात् प्रतिमूर्ति हैं।इसीलिए वे लोककल्याण के लिए सदैव प्रयत्नशील रहते हैं।उन्होंने असंख्य लोगों को भक्तिमार्ग पर चलने की प्रेरणा ही नहीं बल्कि सहयोग एवं मार्गदर्शन भी किया है।भक्त प्रह्लाद ; राजकुमार ध्रुव आदि को नारद जी ने ही भगवच्चरणोन्मुख किया था।उन्होंने वेदव्यास सदृश महान ज्ञानी का भी मार्गदर्शन किया था।उनकी सर्वाधिक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि देव-दानव आदि सभी लोग उन्हें एक समान सम्मान देते थे।साथ ही सब लोग उन पर विश्वास भी करते थे।

वराह अवतार -- डाॅ कृष्ण पाल त्रिपाठी

            भगवान विष्णु के चौबीस अवतारों मे वराह अवतार की गणना द्वितीय स्थान पर की गयी है।श्रीमद्भागवत महापुराण ( 1/ 3/ 7 ) के अनुसार दूसरी बार इस संसार के कल्याण के लिए समस्त यज्ञों के स्वामी उन भगवान ने ही रसातल मे गयी हुई पृथ्वी को निकाल लाने के विचार से सूकर ( वराह ) रूप धारण किया था ---
   द्वितीयं तु भवायास्य रसातलगतां महीम्।
   उद्धरिष्यन्नुपादत्त यज्ञेशः सौकरं वपुः।।
           प्राचीन काल मे भगवान विष्णु के प्रथम अवतार सनकादि ने वैकुण्ठ धाम मे नियुक्त भगवान के पार्षदों -- जय और विजय को तीन जन्मों तक दैत्यकुल मे जन्म लेने का शाप दे दिया था।उसी के परिणामस्वरूप उन दोनो का जन्म महर्षि कश्यप की पत्नी दिति के गर्भ से हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष के रूप मे हुआ था।
            एक बार सायंकाल के समय महर्षि कश्यप भगवान यज्ञपति की आराधना कर अग्निशाला मे ध्यानस्थ होकर बैठे हुए थे।उसी समय उनकी पत्नी दिति ने उनसे महापराक्रमी पुत्र-प्राप्ति के लिए समागम करने का अनुरोध किया।महर्षि ने समझाया कि यह घोर राक्षसी बेला है।इस समय स्त्री-समागम करना उचित नहीं है।परन्तु दिति हठ कर बैठी।उसके प्रबल दुराग्रह से हारकर ऋषिवर ने उसी समय एकान्त मे समागम किया।इसी के परिणाम स्वरूप हिरण्यकशिपु एवं हिरण्याक्ष नामक दो पुत्रों का जन्म हुआ।वे दोनो जन्म लेते ही पर्वताकार हो गये।बाद मे दोनो ने तप करके ब्रह्मा जी से अमित पराक्रमी होने का वरदान प्राप्त कर लिया।दोनों बहुत बर्बर एवं नृशंस थे।उनके अत्याचारों से सर्वत्र त्राहि-त्राहि मच गयी।एक बार हिरण्याक्ष स्वर्गलोक पहुँच गया।उसके भय से सभी देवता भागकर अन्यत्र छिप गये।
           कुछ दिनो बाद हिरण्याक्ष ने पृथ्वी की धारणा-शक्ति का हरण कर लिया और उसे लेकर रसातल मे चला गया।इससे पृथ्वी आधार-शक्ति से रहित हो गयी और स्वयं भी रसातल मे चली गयी।इसे देखकर ब्रह्मा जी बहुत चिन्तित हुए।एक बार वे पृथ्वी के उद्धार के विषय मे सोच रहे थे ; तभी उनकी नाक से अँगूठे के आकार का एक वराह-शिशु प्रकट हुआ।वह क्षण भर मे ही बहुत विशाल हो गया।इसे देखकर ब्रह्मा सहित सभी ऋषि-मुनि ; सनकादि देवता और स्वायम्भुव मनु भी आश्चर्य चकित हो गये।उसने अपनी गर्जना से सभी दिशाओं को प्रतिध्वनित कर दिया।बाद मे वराह रूपी भगवान श्रीहरि पृथ्वी का उद्धार करने के लिए अथाह समुद्र मे घुस गये।कुछ समय बाद वे पृथ्वी को अपनी दाढ़ों पर लेकर रसातल से ऊपर की ओर आने लगे।
             इधर हिरण्याक्ष स्वर्ग से होता हुआ जलाधिपति वरुणदेव के पास गया और उनसे युद्ध-भिक्षा की माँग की।वरुण जी को क्रोध तो बहुत आया किन्तु वे उसे चुपचाप पी गये।बाद मे उन्होंने कहा -- मुझे युद्ध के प्रति रुचि नहीं है।अतः तुम पुराण-पुरुष श्रीहरि के पास जाओ ; वे ही तुम्हारी कामना पूर्ण कर सकेंगे।इसे सुनकर वह नारद के पास गया।नारद जी ने बताया कि इस समय श्रीहरि जी पृथ्वी का उद्धार करने के लिए रसातल मे गये हुए हैं।इतना सुनते ही वह रसातल की ओर चल पड़ा।उस समय वराह रूपी श्रीहरि पृथ्वी को लेकर रसातल से ऊपर की ओर आ रहे थे।हिरण्याक्ष ने श्रीहरि का प्रतिरोध किया।साथ ही भगवान को अपशब्द भी कहा।भगवान चुपचाप आगे बढ़ते रहे।आगे चलकर उन्होंने पृथ्वी को जल के बाहर लाकर विधिवत् स्थापित कर दिया।उसके बाद वे हिरण्याक्ष की ओर बढ़े।दोनों मे भयानक युद्ध आरम्भ हो गया।लम्बे संघर्ष के बाद वराह भगवान ने महापराक्रमी हिरण्याक्ष का वध कर दिया।सभी लोग भगवान की जय जयकार करने लगे।

Saturday, 16 July 2016

श्री सनकादि अवतार -- डाॅ कृष्ण पाल त्रिपाठी

           भगवान विष्णु के चौबीस अवतारों मे श्री सनकादि की गणना प्रथम स्थान पर की गयी है।इनके अवतार की कथा अत्यन्त रोचक एवं शिक्षाप्रद है।एक बार ब्रह्मा जी ने सृष्टि-संरचना करने का विचार बनाया।उन्होंने अपनी अंजुली से जल को ऊपर की ओर उछाला ; जिससे वहाँ एक विशाल अण्ड प्रकट हो गया।वह बिल्कुल निश्चल एवं अचेतन था।ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु की प्रार्थना की।महाविष्णु ने प्रसन्न होकर उस अण्ड मे प्रवेश किया।इससे वह अण्ड सचेतन हो गया।फिर क्रमशः तमोगुणी ; रजोगुणी आदि आठ सृष्टियों का आविर्भाव हुआ।
            इसके बाद ब्रह्मा जी ने अन्य लोकों की रचना करने के लिए कठोर तप किया।उनके अखण्ड तप से प्रसन्न होकर विश्वाधार प्रभुवर ने " तप " अर्थ वाले  ' सन ' नाम से युक्त होकर सनक ; सनन्दन ; सनातन और सनत्कुमार के रूप अवतार लिया।वे चारों ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे।वे प्राकट्य काल से ही परम वैरागी एवं उत्तमोत्तम व्रतधारी थे।उनका मन सदैव भगवच्चिन्तन मे ही लगा रहता था।वे संसार से सर्वथा विरक्त एवं परम तत्त्वज्ञानी थे।अतः ब्रह्मा जी द्वारा आदेशित होने पर भी उन्होंने सृष्टि-रचना मे सहयोग देने से इनकार कर दिया।यद्यपि उस समय ब्रह्मा जी ने बहुत क्रोध किया फिर भी उन चारों कुमारों ने सृष्टि-रचना से विरक्त होकर वैराग्य ले लिया।
           वे चारों सदैव एक साथ रहते थे।उनका स्वरूप अत्यन्त तेजस्वी एवं मनमोहक था।वे सदैव पञ्चवर्षीय कुमारों के रूप मे दिगम्बर वेष मे रहते थे।उनके मन मे किसी भी प्रकार की आसक्ति नहीं थी।वे प्रायः आकाशमार्ग से विचरण करते रहते थे।एक बार वे भगवद्दर्शन की लालसा से वैकुण्ठ धाम पहुँच गये।वहाँ हरिनाम का  स्मरण करते हुए वैकुण्ठ धाम की छः ड्यौढ़ियों को पार कर लिया।परन्तु जैसे ही सातवीं को पार किया ; वैसे ही भगवान के पार्षदों अर्थात् जय-विजय ने उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया।अतः भगवद्दर्शन मे व्यवधान उत्पन्न होने के कारण उन कुमारों को क्रोध उत्पन्न हो गया।उन्होंने जय और विजय को तीन जन्मों तक पापमय दैत्यकुल मे जन्म लेने का शाप दे दिया।आगे चलकर वही दोनों पार्षद क्रमशः हिरण्यकशिपु-हिरण्याक्ष ; रावण-कुम्भकर्ण और शिशुपाल-दन्तवक्त्र के रूप मे उत्पन्न हुए।
            एक बार वे चारों मुनि आकाशमार्ग से विचरण करते हुए भगवान के अंशावतार महाराज पृथु के पास पहुँच गये।राजा ने उनकी विधिवत् पूजा कर उनका चरणोदक लिया।बाद मे पूछा कि इस संसार मे मनुष्य का कल्याण सुगमता पूर्वक किस विधि से हो सकता है ? तब उन्होंने विस्तार पूर्वक कल्याणोपदेश प्रदान करते हुए भगवान के चरण-कमलों का आश्रय ग्रहण करने का सुझाव दिया था।इसे सुनकर महाराज पृथु बहुत प्रसन्न हुए और प्रभुवर की बारंबार स्तुति की।इसके बाद वे आकाशमार्ग से चले गये।
             इसी प्रकार उन्होंने तत्कालीन ऋषियों-महर्षियों को भी अपने अमृतमय ज्ञानोपदेश से आप्यायित किया था।वे चारों ऊर्ध्वरेता मुनियों की भाँति आचरण करते हुए सम्पूर्ण समाज का कल्याण करते रहते थे।वे योगविद्या के परम ज्ञाता ; सांख्यज्ञान-मर्मज्ञ ; धर्मशास्त्र-परायण एवं मोक्ष-प्रदायक साधनों के प्रवर्तक थे। वे भगवान विष्णु के अंशावतार होने के कारण सर्वगुण सम्पन्न एवं परम ज्ञानी थे।

गुरु पूर्णिमा -- डाॅ कृष्ण पाल त्रिपाठी

           गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है।इस दिन गुरु-पूजन का विशेष महत्त्व है।प्राचीन काल मे गुरुकुलों मे प्रत्येक विद्यार्थी इस दिन विविध उपचारों द्वारा अपने गुरु का पूजन करता था।आज भी इस पर्व की उतनी ही महत्ता एवं प्रासंगिकता है।
             मानव-जीवन मे गुरु का महत्त्व सर्वोपरि है।गुरु ही मनुष्य को महामानव बनने की प्रेरणा एवं प्रोत्साहन देता है।उसके मार्गदर्शन के अभाव मे मनुष्य की वास्तविक प्रगति संभव नहीं है।विश्व भर का ज्ञान-विज्ञान गुरु-कृपा से ही प्राप्त होता है।वही हमें सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान कर हमारे निर्मल भविष्य का निर्माण करते हैं।अतः उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक पर्व तो होना ही चाहिए।इसलिए हम सबका परम कर्तव्य है कि गुरु पूर्णिमा के अवसर पर अपने गुरु का पूजन करें और उनके प्रति सच्ची कृतज्ञता व्यक्त करें।
            हमारे देश मे प्राचीन काल से ही गुरु को ब्रह्मा विष्णु महेश एवं परब्रह्म परमात्मा का स्वरूप माना जाता रहा है।इसी गुरुभक्ति के बल पर ही इस देश की ख्याति देश विदेश मे विस्तीर्ण थी।संसार मे जितने भी महापुरुष हुए हैं ; वे सबका सब गुरुकृपा द्वारा ही आगे बढ़े हैं।इसलिए आज भी गुरु का महत्त्व उतना ही है ; जितना पहले था।अतः इस पावन पर्व पर अपने गुरु का पूजन अवश्य करना चाहिए।उनका शुभाशीष ही हमे उन्नति के चरम शिखर पर पहुँचाने के लिए पर्याप्त है।