शास्त्रों मे " अतिथि देवो भव " कहकर अतिथि-सेवा की असीम महत्ता का प्रतिपादन किया गया है।सामान्य रूप से जिसके आगमन की तिथि निर्धारित न हो ; जिसके कुल-वंश ; नाम आदि का ज्ञान न हो और अचानक द्वार पर आ गया हो ; उसे अतिथि कहा जाता है।ऐसे व्यक्ति के आने पर उसके नाम ; गोत्र ; शिक्षा-दीक्षा आदि बिना पूछे ही उसे देवस्वरूप मानकर उसका यथोचित सत्कार करना चाहिए।यदि वह थका-माँदा हो तो उसके विश्राम की व्यवस्था करनी चाहिए।उसके काले-गोरे ; अच्छे-बुरे स्वरूप का ध्यान नहीं करना चाहिए।उसके आते ही उसका यथोचित अभिवादन अवश्य करना चाहिए।
अतिथि को देवस्वरूप मानकर उसके भोजन की व्यवस्था करना नितान्त आवश्यक है।जो व्यक्ति अपने द्वार पर आये हुए अतिथि को भोजन कराये बिना स्वयं भोजन कर लेता है ; पापभोजी होता होता है।उसे अगले जन्म मे भोजन की प्राप्ति नहीं होती है बल्कि वह विष्टाभोजी बन जाता है।जिसके घर से अतिथि बिना सत्कार पाये निराश होकर लौट जाता है ; वह गृहस्वामी के पुण्य को लेकर चला जाता है और गृहस्वामी को अपना पाप दे देता है ---
अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात् प्रतिनिवर्तते।
स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति।।
( मार्क0पु029/31 )
इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि अतिथि-सत्कार को गृहस्थ जीवन का अनिवार्य कर्तव्य मानकर अतिथि सेवा अवश्य करे।परन्तु वर्तमान युग मे दुष्टों की बहुलता के कारण अतिथि के विषय मे कुछ जानकारी करना आवश्यक हो गया है।अतः सन्तोषजनक जानकारी हो जाने के यथाशक्ति सेवा-सत्कार अवश्य करना चाहिए।अन्यथा पापभागी बनना पड़ेगा।
Tuesday, 25 October 2016
अतिथि-सेवा -- डाॅ कृष्ण पाल त्रिपाठी
मानव का सबसे बड़ा शत्रु राग -- डाॅ कृष्ण पाल त्रिपाठी
शास्त्रों मे मानव-जीवन के लिए जो काम ; क्रोध ; लोभ आदि सब से घातक शत्रु बताये गये हैं ; उनमें " राग " का स्थान सर्वोपरि है।राग का अर्थ है -- अनुराग या प्रीति।मनुष्य के मन मे जब किसी सांसारिक वस्तु के प्रति राग या लगाव उत्पन्न हो जाता है तब काम की उत्पत्ति होती है।काम का अर्थ है -- इच्छा।अर्थात् मनुष्य मे उस वस्तु को प्राप्त करने की इच्छा उत्पन्न हो जाती है।काम से लोभ का जन्म होता है।लोभ से सम्मोह या अविवेक की उत्पत्ति होती है।यह तो निश्चित है कि जब लोभ का भूत सवार होता है तब व्यक्ति विवेकशून्य हो जाता है।फिर सम्मोह से स्मरण-शक्ति भ्रान्त हो जाती है।स्मृति के भ्रान्त होने से बुद्धि का विनाश हो जाता है।बुद्धि-विनाश के कारण मनुष्य स्वयं नष्ट हो जाता है।वह अपने कर्तव्यों से विमुख होकर कर्तव्य-भ्रष्ट हो जाता है ---
रागात् कामः प्रभवति कामाल्लोभोऽभिजायते।
लोभाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः।।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।
( मार्कण्डेयपु0 3/71-72)
इस प्रकार मानवजीवन मे विनाश के लिए राग ही सर्वाधिक उत्तरदायी होता है।यदि राग पर यथोचित नियंत्रण रखा जाय तो उसके विनाश की प्रक्रिया रुक सकती है।
ज्योतिष मे चन्द्रमा का महत्व -- डाॅ कृष्ण पाल त्रिपाठी
भारतीय ज्योतिष के जातक प्रकरण मे सूर्य ; चन्द्र ; मंगल ; बुध ; गुरु ; शुक्र ; शनि ; राहु और केतु नौ ग्रहों की मान्यता है।यद्यपि प्राचीन आचार्यों ने राहु और केतु को महत्व नहीं दिया किन्तु वर्तमान काल मे इनका भी पर्याप्त महत्व है।सामान्य रूप से फलादेश मे इन समस्त ग्रहों का महत्व है किन्तु चन्द्रमा का महत्व कुछ अधिक है।यहाँ पर चन्द्रमा की महत्ता प्रदर्शित करने वाले कुछ प्रमुख विन्दुओं पर ही चर्चा की जा रही है।
1-- बच्चे के जन्म के समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र पर स्थित होता है।वही नक्षत्र बच्चे का जन्म नक्षत्र माना जाता है।जब कि सूर्यादि सभी ग्रह किसी न किसी नक्षत्र पर होते हैं किन्तु बच्चे का जन्म नक्षत्र बताने मे चन्द्रमा के अतिरिक्त अन्य किसी ग्रह के नक्षत्र का कोई महत्व नहीं होता है।
2-- नक्षत्रों के आधार पर ही राशि का निर्माण होता है।बच्चे के जन्म-काल मे चन्द्रमा जिस राशि पर होता है।वही राशि बच्चे की जन्म-राशि मानी जाती है।भारतीय मतानुसार इसी आधार पर राशिफल दिया और देखा जाता है।
3-- जन्मकुण्डली का फलादेश अधिकतर जन्म-लग्न के आधार पर किया जाता है।किन्तु अनेक स्थलों पर राशि चक्र के आधार पर भी फलादेश करने का विधान है।इसीलिए कुण्डली मे लग्न-कुण्डली के साथ चन्द्र-कुण्डली ( राशि चक्र ) भी दी जाती है।
4-- चन्द्रमा की उत्पत्ति विराटपुरुष के मन से हुई है --
चन्द्रमामनसोजातश्चक्षोः सूर्योऽअजायत।
इसीलिए ज्योतिष मे चन्द्रमा को मन का स्वामी माना गया है।संसार के प्रत्येक प्राणी के क्रिया-कलाप पर मन का सर्वाधिक प्रभाव रहता है।प्रत्येक व्यक्ति अपने मन के अनुसार ही कार्य करता है।कभी-कभी वह मन के वशीभूत होकर समस्त नियमों एवं मर्यादाओं का भी उल्लंघन कर जाता है।इस आधार पर भी ज्योतिष मे चन्द्रमा की महत्ता स्वयमेव स्पष्ट है।
5-- चन्द्रमा कर्क राशि का स्वामी है।अतः कर्क लग्न मे जन्म लेने वाले व्यक्ति बहुत भावुक एवं सहृदय होते हैं।उनके प्रत्येक कार्य मे भावुकता का अंश स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।कभी-कभी वे भावुकता के वश मे आकर ऐसा कार्य कर बैठते हैं ; जो उन्हें नहीं करना चाहिए।
6-- जन्माङ्ग मे अष्टम स्थान पर गया हुआ क्षीण चन्द्रमा सर्वाधिक घातक होता है।इतना घातक या प्रभावशाली अन्य कोई भी ग्रह नहीं होता है।
7-- ज्योतिष मे फलादेश करते समय विभिन्न योगों मे चन्द्रमा का योग विशेष रहा करता है।
8-- चन्द्रमा एक ऐसा ग्रह है ; जो राहु-केतु को छोड़कर अन्य किसी को भी अपना शत्रु नहीं मानता है।इतना तक कि बुध उसे अपना शत्रु मानता है किन्तु चन्द्रमा उसे अपना मित्र मानता है।बुध चन्द्रमा का ही पुत्र है।
9-- यदि सबल चन्द्रमा लग्न अथवा अन्य शुभ स्थान पर हो तो व्यक्ति को सर्वोच्च शिखर पर पहुँचा देता है।
10-- राहुकृत दोष को बुध शान्त करता है ; इन दोनों के दोषों को शनि शान्त कर देता है।राहु बुध और शनि के दोष को मंगल शान्त करता है तथा इन चारों के दोषों को शुक्र शान्त कर देता है।राहु बुध शनि भंगल तथा शुक्र के दोष को गुरु शान्त करता है।परन्तु इन छहों ग्रहों के दोषों को अकेले चन्द्रमा ही शान्त कर देता है।इस प्रकार चन्द्रमा का महत्व अन्य ग्रहों की अपेक्षा अधिक है।
11-- चन्द्रमा माता का कारक है।संसार मे माता से अधिक महत्व वाला कोई भी सम्बन्धी नहीं है।अतः उसके कारक ग्रह की महत्ता स्वयमेव सिद्ध है।
Monday, 24 October 2016
सूर्योपासना -- डाॅ कृष्ण पाल त्रिपाठी
सूर्यदेव प्रत्यक्ष देवता हैं।उनके अस्तित्व के विषय मे किसी भी प्रकार का सन्देह अथवा ऊहापोह का प्रश्न ही नहीं उठता है।अतः ऐसे सर्व-शक्तिमान प्रत्यक्ष देवता की उपासना अवश्य करनी चाहिए।उनके स्तवन ; जप ; व्रत ; उपहार-समर्पण ; पूजन ; भजन आदि से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।पृथ्वी पर मस्तक रखकर सूर्यदेव को प्रणाम करने से मनुष्य तत्काल पापमुक्त हो जाता है।इसमे तनिक भी सन्देह नहीं है।जो व्यक्ति श्रद्धा-भक्ति पूर्वक भगवान सूर्य नारायण की परिक्रमा करता है ; उसे सातों द्वीपों सहित सम्पूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा का फल प्राप्त हो जाता है।जो व्यक्ति सूर्यदेव को अपने हृदय मे धारण करके केवल आकाश की परिक्रमा करता है ; उसके द्वारा समस्त देवताओं की परिक्रमा सम्पन्न हो जाती है ---
सूर्यं मनसि यः कृत्वा कुर्याद् व्योमप्रदक्षिणाम्।
प्रदक्षिणीकृतास्तेन सर्वे देवा भवन्ति हि।।
आकाशगंगा का जल -- डाॅ कृष्ण पाल त्रिपाठी
सामान्य रूप से सूर्यदेव पृथ्वी पर स्थित जल को ग्रहण कर उसे मेघों मे स्थापित करने के बाद पृथ्वी पर वर्षा करते हैं।परन्तु कभी-कभी वे आकाशगंगा के जल को भी लेकर उसे मेघों मे स्थापित किये बिना ही पृथ्वी पर बरसा देते हैं।यह जल अत्यन्त शुद्ध एवं पवित्र होता है।यह जल अन्नादि के लिए तो अमृत तुल्य होता ही है साथ ही प्राणियों के समस्त पापों का नाश करने वाला और वैकुण्ठ की प्राप्ति कराने वाला होता है।
सूर्यदेव जब कृत्तिका आदि विषम नक्षत्रों पर स्थित होते हैं ; उस समय वर्षा से प्राप्त होने वाला जल ; दिग्गजों द्वारा फेंका हुआ आकाशगंगा का जल होता है।यह बहुत पवित्र एवं पापनाशक होता है।इसी प्रकार भरणी आदि सम नक्षत्रों मे स्थित सूर्य के समय मे आकाश से गिरने वाला जल आकाशगंगा का ही जल होता है।ये दोनों जल बहुत पवित्र एवं पाप-नाशक होते हैं।इनके स्पर्श मात्र से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।वह मनुष्य सुख पूर्वक जीवन यापन कर स्वर्गलोक को प्राप्त होता है।उसे नरक लोक की यातनाओं का सामना नहीं करना पड़ता है।अतः वर्षा के जल का स्पर्श अवश्य कर लेना चाहिए।संभव है कि वह आकाशगंगा का ही जल हो।इससे बिना प्रयास ही असीम पुण्य की प्राप्ति हो जाती है।
बादल को अभ्र क्यों कहते हैं ? -- डाॅ कृष्ण पाल त्रिपाठी
संसार की प्रत्येक वस्तु के कई पर्यायवाची शब्द होते हैं।बादल के भी अनेक पर्याय हैं।उन्हीं मे " अभ्र " भी है।वस्तुतः भगवान सूर्यदेव आठ महीने तक अपनी किरणों द्वारा रसात्मक जल का संग्रह करते हैं।फिर उसी को वर्षा ऋतु मे बरसात के रूप मे परिणत कर देते हैं।बादल की सृष्टि मे धूम्र ; अग्नि ; वायु और जल का योग रहता है।बादलों मे स्थापित किया गया जल कभी अपभ्रष्ट नहीं होता है।इसीलिए बादलों को " अभ्र " कहा जाता है।
Saturday, 22 October 2016
रवि-पुष्य योग -- डाॅ कृष्ण पाल त्रिपाठी
वार एवं नक्षत्र के सम्मिलन से बनने वाले योगों मे रवि-पुष्य योग का अद्वितीय महत्त्व है।रविवार को जब पुष्य नक्षत्र होता है ; तब रवि-पुष्य योग बनता है।इसमे रविवार और पुष्य नक्षत्र दोनों ही बहुत प्रभावशाली हैं।रविवार के अधिष्ठातृ देव भगवान सूर्य नारायण हैं।वे सम्पूर्ण संसार को प्रकाश प्रदान करने वाले प्रत्यक्ष देवता हैं।वे सभी ग्रहों के अधिपति हैं।इसीलिए उन्हें ग्रहराज भी कहा जाता है।रविवार स्थिर संज्ञक दिन है।इस दिन शान्तिकर्म ; उद्यान लगाना तथा स्थिर कर्म करना शुभ होता है।
पुष्य नक्षत्र सभी नक्षत्रों मे सबसे शुभ एवं प्रभावशाली माना जाता है।ज्योतिष मे इसे नक्षत्र सम्राट की संज्ञा प्रदान की गयी है।पुष्य नक्षत्र के स्वामी देवगुरु वृहस्पति हैं।केवल वैवाहिक कृत्य को छोड़कर अन्य सभी कार्य पुष्य नक्षत्र मे शुभ होते हैं।यह समस्त दोषकारक शक्तियों को निस्तेज कर देता है।इस नक्षत्र मे किया गया प्रत्येक कार्य स्थिर एवं शुभदायी होता है ---
पुष्यः परकृतं हन्ति न तु पुष्यकृतं परः।
दोषं यद्यष्टमोऽपीन्दुः पुष्यः सर्वार्थसाधकः।।
इस प्रकार अत्यन्त प्रभावशाली वार एवं नक्षत्र के मेल से बनने वाला रवि-पुष्य योग निश्चित रूप से सर्वार्थ-साधक होता है।यह योग यन्त्र ; मन्त्र ; तन्त्र आदि की सिद्धि के लिए बहुत शुभद होता है।इसमे औषधि-सेवन भी बहुत शुभ फलदायक होता है।इस दिन घर गृहस्थी की वस्तुयें खरीदना भी बहुत लाभप्रद होता है।ज्योतिषीय दृष्टि से यह बहुत उत्तम योग माना जाता है।