शिव जी बहुत लीला विहारी हैं।वे कभी कभी बहुत विचित्र लीला कर बैठते हैं।एक बार देवराज इन्द्र ने समस्त देवताओं एवं गुरु बृहस्पति के साथ भगवान शिव जी का दर्शन करने के लिए प्रस्थान किया।शिव जी उनकी भक्ति की परीक्षा लेने के लिए अवधूत रूप मे प्रकट होकर मार्ग मे खड़े हो गये।किन्तु इन्द्र अपने अहंकार के कारण उन्हें पहचान नहीं सके।इसलिए उन्होंने सर्वप्रथम अवधूत जी का परिचय पूछा उसके बाद शिव जी के विषय मे जानकारी प्राप्त करनी चाही।इन्द्र ने पूछा कि शिव जी कहाँ हैं ? हम लोग उनका दर्शन करना चाहते हैं।
इन्द्र ने इसी प्रश्न को कई बार पूछा किन्तु उनकी गर्वोक्ति को सुनकर शिव जी ने कोई उत्तर नहीं दिया।अब तो इन्द्र के क्रोध की सीमा न रही।उन्होंने क्रोधावेश मे आकर शिव जी के लिए अनेक अपमान जनक शब्द कहे।इतना ही नहीं बल्कि उन पर प्रहार करने के लिए वज्र उठा लिया।शिव जी ने वज्र सहित इन्द्र का हाथ स्तम्भित कर दिया और क्रोध के कारण जो तेज उत्पन्न हुआ ; उससे उनका शरीर प्रज्ज्वलित हो उठा।इस दृश्य को देखकर बृहस्पति ने समझ लिया कि ये कोई अन्य नहीं बल्कि स्वयं शिव जी ही हैं।अतः बृहस्पति ने उन्हें प्रणाम किया और उनकी स्तुति करने लगे।उन्होने इन्द्र को भी शिव जी के चरणों गिरा कर क्षमा याचना की।
बृहस्पति की स्तुति एवं इन्द्र की शरणगति से शिव जी प्रसन्न हो गये।उन्होंने हँसते हुए कहा कि क्रोध के कारण मेरे नेत्रों से निकली हुई अग्नि को वापस करना सम्भव नहीं है।इसलिए इस अग्नि को मै बहुत दूर भेज रहा हूँ।इतना कहकर शिव जी ने उस अग्नि को समुद्र मे फेंक दिया।तभी उस तेज से एक बालक उत्पन्न हुआ जो जलन्धर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।इस प्रकार सभी को वरदान देकर शिव जी अन्तर्धान हो गये।
Friday, 20 May 2016
अवधूतेश्वर अवतार -- डाॅ कृष्ण पाल त्रिपाठी
Thursday, 19 May 2016
कृष्णदर्शन अवतार -- डाॅ कृष्ण पाल त्रिपाठी
वर्तमान मन्वन्तर के मनु का नाम वैवस्वत मनु है।इन्हें श्राद्धदेव भी कहा जाता है।इनके इक्ष्वाकु आदि नौ पुत्र थे।उन्हीं मे से एक पुत्र का नाम " नभग " था।उन्हीं को ज्ञान प्रदान करने के लिए भगवान शिव जी ने कृष्णदर्शन अवतार लिया था।
नभग जब विद्याध्ययन हेतु गुरुकुल मे निवास कर रहे थे ; तभी इक्ष्वाकु भाइयों ने पिता की सम्पत्ति का बँटवारा किया।किन्तु उन लोगों ने नभग को हिस्सा नही दिया।नभग जब विद्याध्ययन कर घर आये तो अपना हिस्सा माँगा।उस समय भाइयों ने कहा कि सम्पत्ति-विभाजन के समय तुम नहीं थे।इसलिए तुम्हारा हिस्सा लगाना भूल गये।अब पिता जी को अपने हिस्से के रूप मे ले लो।
दुःखी नभग अपने पिता के पास और उन्हें सम्पूर्ण वृत्तान्त से अवगत कराया।पिता ने कहा कि भाइयों ने तुम्हें ठगने के लिए यह बात कही है।फिर भी मै तुम्हारी जीविका के लिए एक उपाय बतलाता हूँ।इस समय आंगिरस गोत्रीय ब्राह्मण एक विशाल यज्ञ कर रहे हैं।परन्तु वे प्रत्येक छठवें दिन के कार्य मे त्रुटि कर जाते हैं।तुम उन्हें उस अवसर पर विश्वेदेव सम्बन्धी दो सूक्त बतला दिया करो।जब यज्ञ सम्पन्न हो जायेगा ; तब वे यज्ञावशिष्ट धन तुम्हें दे देंगे।
पिता जी के निर्देशानुसार नभग वहाँ गये और उस कार्य को सकुशल सम्पन्न किया।यज्ञ सम्पन्न होने पर ब्राह्मणगण जब स्वर्गलोक जाने लगे तब सम्पूर्ण यज्ञावशिष्ट धन नभग को दे दिया।नभग उस धन को संकलित कर रहे थे ; तभी शिव जी कृष्णदर्शन रूप मे प्रकट हो गये।उन्होंने कहा कि तुम इस धन को क्यों ले रहे हो ? यह तो मेरे अधिकार की सम्पत्ति है।इस बात को सुनकर नभग जी अवाक् रह गये।शिव जी ने कहा कि इस विषय मे तुम्हारे पिता ही साक्ष्य हैं।उन्हीं से पूछ लो।वे जो निर्णय देंगे ; उसे हम दोनों मानेंगे।
नभग अपने के पास आये और उस विषय मे पूछा।श्राद्धदेव ने शिव जी का ध्यान किया और नभग को बतलाया कि वे साक्षात् शिव जी हैं।यज्ञावशिष्ट धन पर उन्हीं का अधिकार होता है।वे तुम पर कृपा करने के लिए ही प्रकट हुए हैं।तुम उन्हें ही प्रसन्न करो।नभग वापस आये और उन्हें प्रणाम कर उनकी स्तुति करने लगे।शिव जी प्रसन्न हो गये।उन्होंने नभग को ब्रह्मतत्त्व का ज्ञान और सम्पूर्ण धन सहर्ष प्रदान कर दिया।इसके बाद वे अन्तर्धान हो गये।नभग अपने पिता के पास चले आये।उन्होंने दीर्घकाल तक सुखोपभोग कर अन्त मे शिवधाम को प्राप्त किया।
द्विजेश्वर अवतार -- डाॅ कृष्ण पाल त्रिपाठी
प्राचीन काल मे भद्रायु नामक एक महा प्रतापी राजा थे।उनकी पत्नी का नाम कीर्तिमालिनी था।वे दोनो शिव जी के अनन्य भक्त थे।एक बार वे वन मे विहार करने गये।उसी समय शिव जी ने उनकी भक्ति की परीक्षा लेने के लिए एक लीला रच दी।
शिव जी ब्राह्मण के रूप मे और पार्वती जी ब्राह्मणी के रूप मे प्रकट हुईं।उन्होंने एक मायामय व्याघ्र की रचना की और उसके भय से रोते-चिल्लाते हुए दोनो भागने लगे।व्याघ्र उनका पीछा कर रहा था।वे भाग कर राजा के पास गये और अपनी रक्षा के लिए निवेदन किया।राजा ने जैसे ही धनुष-बाण उठाया ; वैसे ही व्याघ्र ने ब्राह्मणी को दबोच लिया।राजा ने व्याघ्र पर असंख्य प्रहार किये किन्तु उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।वह ब्राह्मणी को घसीटता हुआ बहुत दूर तक चला गया।
इस घटना से ब्राह्मण बहुत दुःखी हुआ।उसने राजा को धिक्कारते हुए कहा कि शरणागत की रक्षा करना राजा का परम धर्म है।उसकी रक्षा प्राणपण से करनी चाहिए।यदि वह पीड़ितों की रक्षा करने मे समर्थ नहीं है तो उसका जीवित रहना व्यर्थ है।इस प्रकार धिक्कारे जाने पर राजा ने सोचा कि अब और अधिक निन्दित होने की अपेक्षा प्राणोत्सर्ग करना ही श्रेयस्कर होगा।यह सोचकर उसने ब्राह्मण से कहा कि अब यह राज्य ; रानी ; धन और मेरा शरीर आपके अधीन है।आपकी जैसी आज्ञा हो मै वैसा सी करूँ।ब्राह्मण ने कहा कि मुझे तुम्हारे राज्य ; धन एवं शरीर की आवश्यकता नहीं है।केवल अपनी पत्नी ही मुझे दे दो।
यह बात राजा को अच्छी नहीं लगी।उसने डाँटते हुए कहा कि आपकी यह बात ब्राह्मणोचित नहीं है।परस्त्री का स्पर्श भी महापाप है।ब्राह्मण ने कहा कि मै अपनी तपस्या से इस पाप को दूर कर लूँगा।राजा विवश था।उसने अपनी पत्नी ब्राह्मण को सौंप दी और स्वयं अग्नि मे प्रवेश करने के लिए उद्यत हुआ।उसी समय पार्वती सहित शिव जी अपने वास्तविक स्वरूप मे प्रकट हो गये।उन्होंने समझाया कि हे राजन् ! मै तुम्हारी परीक्षा ले रहा था।तुम उसमे सफल हो गये हो।इसलिए अब मनोवाँछित वर माँगो।राजा ने कहा कि आपका दर्शन हो गया है।अब इससे बढ़कर दूसरा वर क्या होगा ?
रानी ने अपने माता-पिता के लिए शिव-धाम-प्राप्ति का वर माँगा।उसे शिव जी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया।इसके बाद शिव एवं पार्वती अन्तर्धान हो गये।राजा-रानी ने दीर्घकाल तक साँसारिक सुखों का भोग करने के बाद अन्त मे शिवधाम को प्राप्त किया।
Wednesday, 18 May 2016
यतिनाथ एवं हंस अवतार -- डाॅ कृष्ण पाल त्रिपाठी
प्राचीन काल मे अर्बुदाचल पर्वत के समीप आहुक नामक एक भील अपनी पत्नी आहुका के साथ निवास करता था।वे दोनों शिव जी के अनन्य भक्त थे।एक बार सन्ध्याकाल मे उनकी भक्ति की परीक्षा लेने के लिए शिव जी यति ( सन्यासी ) रूप मे प्रकट हुए।वे भील के पास गये और कहा कि आज रात्रि मै तुम्हारे घर मे निवास करना चाहता हूँ।प्रातः होते ही चला जाऊँगा।
भील का घर बहुत छोटा था।अतः उसने निवेदन किया कि मेरे घर मे बहुत थोड़ी सी जगह है।उसमे आपका निवास कैसे हो सकेगा ? परन्तु भीलनी ने सोचा कि अतिथि को स्थान न देने पर दोष होगा।इसलिए उसने कहा कि आप दोनो लोग अन्दर रहें।मै घर के बाहर ही रात्रि व्यतीत कर लूँगी।अन्त मे भील ने यति एवं अपनी पत्नी को घर के अन्दर सुला दिया और स्वयं घर के बाहर खड़ा हो गया।दैवयोग से रात्रि मे भील को हिंसक पशुओं ने खा डाला।
प्रातःकाल यति ने जब भील को मृत देखा तब वे बहुत दुःखी हुए।भीलनी को भी असीम दुःख हुआ परन्तु उसने अपनी भक्ति एवं धैर्य को नहीं छोड़ा।उसने यति को सान्त्वना देते हुए कहा कि इसमे आपका कोई दोष नहीं है।मेरे भाग्य मे यही लिखा था।इसके बाद उसने अपने पति का अनुसरण करने के लिए चिता बनाकर उसमे प्रवेश किया।उसी समय शिव जी अपने वास्तविक स्वरूप मे प्रकट हो गये और उससे वर माँगने को कहा।भीलनी इतना प्रसन्न हुई कि उसकी सुध-बुध खो गयी।शिव जी ने कहा कि यह मेरा यति रूप है।भावी जन्म मे यही तुम दोनो का पुनर्मिलन करायेगा।
शिव जी उसी स्थान पर लिंगरूप मे प्रतिष्ठित हो गये और अचलेश नाम से प्रसिद्ध हो गये।कालान्तर वह भील निषध-नरेश वीरसेन के पुत्र नल के रूप मे उत्पन्न हुआ।भीलनी विदर्भ-नरेश भीम की पुत्री दमयन्ती के रूप मे उत्पन्न हुई।यति रूपधारी शिव जी हंस के रूप मे प्रकट हुए।बाद मे इस हंस ने ही नल-दमतन्ती का संयोग कराया था।
पिप्पलाद अवतार -- डाॅ कृष्ण पाल त्रिपाठी
एक बार दैत्यों ने वृत्रासुर के सहयोग से इन्द्रादि देवताओं को पराजित कर दिया।सभी देवगण ब्रह्मा जी के पास गये और अपनी व्यथा सुनायी।ब्रह्मा जी ने बताया कि महर्षि दधीचि ने शिवोपासना करके अपनी अस्थियों को वज्र सदृश होने का वर प्राप्त कर लिया है।यदि उन अस्थियों से वज्रदण्ड का निर्माण किया जाय तो उससे वृत्रासुर का वध किया जा सकता है।
इसे सुनकर सभी देवगण महर्षि दधीचि के आश्रम पर गये और एकान्त मे अपना प्रयोजन बताया।महर्षि ने शिव जी का ध्यान करके अपना शरीर छोड़ दिया।विश्वकर्मा ने उन अस्थियों से वज्र आदि अस्त्रों का निर्माण किया।इन्द्र ने वृत्रासुर पर आक्रमण करके उसी वज्र से उसका वध कर दिया।इससे सम्पूर्ण देव समाज प्रसन्न हो गया।
इधर महर्षि की पत्नी सुवर्चा जब आश्रम के अन्दर गयीं तो वहाँ अपने पति को मृत पाया।उन्होंने क्रुद्ध होकर सभी देवताओं को पशु होने का शाप दे दिया।इसके बाद उन्होंने पतिलोक मे जाने के लिए चितारोहण का उपक्रम किया।उसी समय शिव जी की प्रेरणा से आकाशवाणी हुई कि तुम्हारे गर्भ मे मुनि का तेज विद्यमान है।अतः उस गर्भ की रक्षा के लिए चितारोहण मत करो।
आकाशवाणी को सुनकर उन्होंने चितारोहण का विचार तो त्याग दिया किन्तु पत्थर से अपने उदर को विदीर्ण कर दिया।इससे परम दिव्य एवं प्रकाशमान शरीर वाला एक बालक उत्पन्न हुआ।वह बालक साक्षात् रुद्र का अवतार था।ऋषि-पत्नी ने उसकी स्तुति करके उसे अश्वत्थ वृक्ष के समीप चिरकाल तक स्थित रहने का आदेश दिया।उसके बाद वे समाधियोग द्वारा पतिलोक को चली गयीं।
उसके बाद इन्द्रादि देवगण सहित अनेक ऋषि मुनि वहाँ पहुँच गये।सबने उनकी स्तुति की।उस बालक ने उस समय अश्वत्थ ( पीपल ) के पत्ते खाये थे ; इसलिए उनका नाम पिप्पलाद रख दिया।उन्होंने उसी पीपल के नीचे चिरकाल तो तपस्या की।बाद मे उन्होंने वरदान दिया कि सोलह वर्ष की अवस्था वाले मनुष्यों तथा शिवभक्तों को शनि की पीड़ा नहीं होगी।उनका यह वरदान आज भी चरितार्थ हो रहा है।
Tuesday, 17 May 2016
गृहपति अवतार -- डाॅ कृष्ण पाल त्रिपाठी
शिव जी के असंख्य अवतारों मे गृहपति अवतार का बहुत महत्त्व है।इन्हें अग्न्यवतार भी कहा जाता है।इनके प्राकट्य की कथा बहुत रोचक और शिक्षाप्रद है।
प्राचीन काल मे नर्मदा नदी के तट पर स्थित नर्मपुर नगर मे विश्वानर नामक एक शिवभक्त मुनि रहते थे।एक दिन उनकी पत्नी शुचिष्मती ने उनसे महेश्वर सदृश पुत्र की याचना की।मुनिवर अपनी पत्नी को आश्वासन देकर शिव जी की आराधना करने के लिए काशी की ओर चल पड़े।वहाँ पहुँच कर उन्होंने वीरेशलिंग की त्रिकाल अर्चना करते हुए घोर तप किया।एक वर्ष के बाद उन्हें शिवलिंग के मध्य एक अष्टवर्षीय विभूति-विभूषित बालक दिखायी दिया।उसका स्वरूप शिव जी के ही समान था।मुनिवर ने उन्हें परमेश्वर शिव जानकर अभिलाषाष्टक स्तोत्र द्वारा उनकी स्तुति की।
बालरूपी शिव जी ने कहा कि हे मुनिश्रेष्ठ ! मै तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हूँ।अतः तुम वर माँगो।विश्वानर मुनि ने कहा कि आप तो सर्वान्तर्यामी हैं।इसलिए अपनी इच्छानुसार वर प्रदान करें।शिव जी ने कहा कि मै तुम दोनो पति-पत्नी की अभिलाषा के अनुरूप आपके पुत्र रूप मे प्रकट होऊँगा।इसी वरदान के परिणाम स्वरूप शिव जी शुचिष्मती के गर्भ से पुत्र रूप मे अवतरित हुए।उस समय उनका नाम गृहपति रखा गया।
एक बार गृहपति का दर्शन करने के लिए नारद जी आये।उन्होने गृहपति को देखकर बताया कि यह बालक सर्वगुण सम्पन्न है किन्तु बारह वर्ष की आयु मे इसे बिजली अथवा अग्नि द्वारा भय उत्पन्न होगा।इसे सुनकर विश्वानर मुनि रोने लगे।उस समय गृहपति ने अपने माता-पिता को सान्त्वना देते हुए कहा कि मै भगवान मृत्युञ्जय की आराधना करके महाकाल को भी जीत लूँगा।अतः आप लोग निश्चिन्त रहें।
इसके बाद गृहपति काशी गये और भगवान विश्वनाथ का दर्शन किया।उसके बाद शुभ मुहूर्त मे शिवलिंग की स्थापना करके उनकी आराधना करने लगे।कुछ दिनो बाद देवराज इन्द्र प्रकट हुए और उनसे वर माँगने को कहा।गृहपति ने उन्हें दुत्कारते हुए कहा कि तुम दुराचारी हो।मै तुमसे वर-याचना नहीं करूँगा।मेरे वरदायक केवल शिव जी ही हैं।इसे सुनकर इन्द्र बहुत क्रुद्ध हुआ।उसने वज्र से प्रहार करना चाहा।उसी समय शिव जी प्रकट हो गये।उन्होंने बताया कि इन्द्र रूप मे प्रकट होकर मै ही तुम्हारी परीक्षा ले रहा था।तुम उस परीक्षा मे सफल हो गये हो।अब तुम्हारे ऊपर यमराज का भी प्रभाव नहीं पड़ेगा।तुम्हारे द्वारा स्थापित यह शिवलिंग " अग्नीश्वर " नाम से प्रसिद्ध होगा।इनका दर्शन करने से मनुष्य बिजली और अग्नि से भयभीत एवं पीड़ित नहीं होगा।
Monday, 16 May 2016
श्रीघुश्मेश्वर -- डाॅ कृष्ण पाल त्रिपाठी
द्वादश ज्योतिर्लिंगों के क्रम मे श्री घुश्मेश्वर जी की गणना द्वादश स्थान पर की जाती है।ये महाराष्ट्र प्रान्त मे दौलताबाद से लगभग 18 किमी दूरी पर वेरुलगाँव के पास प्रतिष्ठित हैं।इनके आविर्भाव की कथा बहुत रोचक एवं शिक्षाप्रद है।
दक्षिण भारत मे देवगिरि पर्वत के समीप सुधर्मा नामक एक ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण रहते थे।उनकी पत्नी का नाम सुदेहा था।वे दोनो बहुत सदाचारी ; दानी एवं शिवभक्त थे।परन्तु उनके कोई पुत्र नहीं था।इससे वे बहुत दुखी रहते थे।उन्होंने पुत्र-प्राप्ति के लिए उपाय भी किये किन्तु सफलता नहीं मिली।अन्ततोगत्वा सुदेहा ने अपने पति का दूसरा विवाह अपनी छोटी बहन घुश्मा से करवा दिया।
घुश्मा भी बहुत धार्मिक थी।वह नित्य पार्थिव-पूजन करती और समीपवर्ती सरोवर मे उनका विसर्जन करती थी।भगवान शिव जी की कृपा से उसको एक गुणी पुत्र हुआ।इससे उसकी सौत सुदेहा को ईर्ष्या होने लगी।बाद मे पुत्र का विवाह हुआ और बहू आ गयी।अब तो सुदेहा की जलन और अधिक बढ़ गयी।उसने रात्रि मे सोते हुए पुत्र को छुरे से काट डाला और उसके शरीर के टुकड़ों को उसी सरोवर मे डाल दिया ; जिसमे घुश्मा पार्थिवलिंगों का विसर्जन करती थी।
प्रातः होते ही सभी लोग नित्यकर्म मे लग गये।घुश्मा पार्थिव-पूजन करने लगी।उसी समय बहू ने देखा कि उसके पति की शय्या खून से भीगी हुई थी।वहाँ शरीर के कुछ टुकड़े भी पड़े हुए थे।उसने करुण-क्रन्दन करते हुए अपनी सास घुश्मा से बताया।घुश्मा भी बहुत दुःखी हुई किन्तु उसने विलखते हुए कहा कि जिन शिव जी ने यह पुत्र दिया है ; वही उसकी रक्षा करेंगे।यह कहकर उसने पार्थिव-पूजन सम्पन्न किया और उसी सरोवर मे उन्हें विसर्जित करने चली गयी।पार्थिवलिंगों को विसर्जित करके जब वापस होने लगी ; तब उसका पुत्र वहीं खड़ा मिला।घुश्मा हर्ष-विषाद से रहित होकर निर्निमेष पलकों से उसे देखती रही।उसी समय ज्योतिः स्वरूप शिव जी प्रकट हो गये।
घुश्मा उनकी प्रार्थना करने लगी।शिव जी ने उससे वर माँगने को कहा।साथ ही उसकी सौत को कठोर दण्ड देने की बात कही।घुश्मा ने निवेदन किया कि वह मेरी बड़ी बहन है।आपको उसकी रक्षा करनी चाहिए।इसे सुनकर शिव जी और अधिक प्रसन्न हुए और पुनः वर माँगने को कहा।घुश्मा ने कहा कि यदि आप वर देना चाहते हैं तो लोककल्याण के लिए सदैव यहीं निवास करें और आपकी प्रसिद्धि मेरे नाम से हो।शिव जी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया।उसी समय से वे घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग नाम से विख्यात हो गये।
बाद मे शिव जी ने कहा कि यह सरोवर शिवलिंगों का आलय बनकर " शिवालय " नाम से प्रसिद्ध होगा।इनका दर्शन करने से सर्वाभीष्टों की प्राप्ति अवश्य होगी।श्री घुश्मेश्वर जी आज भी बहुत प्रसिद्ध हैं।इनकी महत्ता असीम एवं अनिवर्चनीय है।इनके दर्शन एवं पूजन से हर प्रकार के सुख की प्राप्ति होती है।