शिव जी नटराज हैं ही।वे कभी-कभी ऐसी विचित्र लीला कर बैठते हैं ; जो साधारण प्राणियों की बात छोड़िए देवी-देवताओं की समझ से भी बाहर रहती है।ऐसी ही एक विचित्र लीला उन्होंने हिमालय के घर पर दिखाई थी।
पार्वती जी की तपस्या जब सफल हो गयी और शिव जी से उन्हें पत्नी रूप मे वरण करने का वर प्राप्त हो गया ; तब वे अपने घर आ गयीं।उसी समय भगवान शिव जी नट का रूप धारण कर मेना के समक्ष प्रस्तुत हुए।उनके बायें हाथ मे श्रृंग और दाहिने हाथ मे डमरू विराजमान था।उन्होंने मेना के समीप बैठी हुई स्त्रियों के समक्ष बहुत सुन्दर नृत्य एवं गीत प्रस्तुत किया।थोड़ी ही देर मे सम्पूर्ण नगरवासी भी उपस्थित हो गये।सभी लोग उनकी लीला देखकर मन्त्रमुग्ध हो गये।उस समय वे सभी नागरिकों की दृष्टि मे नट के रूप मे दिखाई पड़ रहे थे ; किन्तु पार्वती ने अपने हृदय मे साक्षात् शिव जी का दर्शन किया।तब पार्वती ने मन ही मन उन्हें प्रणाम किया और वर माँगा कि आप मेरे पति हो जाइये।शिव जी उन्हें मनोवाँछित वर प्रदान कर पुनः नृत्य करने लगे।
इधर मेना एक स्वर्णमयी थाली मे अनेक प्रकार के रत्न लेकर आयीं और नट को देने लगीं।नटराज ने उसे लेने से इनकार कर दिया।उसने कहा कि यदि आप मुझे कुछ देना चाहती हैं तो मुझे अपनी पुत्री प्रदान करें।इसे सुनकर मेना बहुत क्रुद्ध हुईं और उसे डाँटने लगीं।उसी समय हिमवान भी आ गये।उन्होंने अपने सेवकों को आदेश दिया कि इसे पकड़कर बाहर निकाल दो।परन्तु उस समय नटराज अग्नितुल्य प्रज्ज्वलित हो उठे।उन्हें स्पर्श करने मे भी कोई सक्षम नहीं हुआ।सभी लोग उसे देखकर आश्चर्यचकित हो गये।
नटराज ने अपनी लीला बन्द नहीं की।उन्होंने तत्काल ब्रह्मा ; विष्णु ; रुद्र आदि का रूप धारण कर लिया।इसे देखकर हिमवान जी इतना आश्चर्यचकित हुए कि वे परमानन्द मे निमग्न हो गये।उधर नटराज भिक्षारूप मे केवल पार्वती को ही माँग रहे थे।परन्तु शिव-माया से मोहित हिमवान ने उनकी बात नहीं मानी।अन्ततोगत्वा शिव जी अन्तर्धान हो गये ; तब मेना और हिमालय को ज्ञात हुआ कि ये तो शिव जी ही थे।वे अपनी माया से हमे छल रहे थे।इस ज्ञान के उदय होने से उनके हृदय मे शिव जी के प्रति और अधिक श्रद्धा एवं भक्ति का प्रादुर्भाव हो गया।
Thursday, 9 June 2016
शिव जी की नटलीला -- डाॅ कृष्ण पाल त्रिपाठी
शिव जी द्वारा पार्वती की परीक्षा -- डाॅ कृष्ण पाल त्रिपाठी
पार्वती जी की तपस्या के स्तर को सुनकर शिव जी ने स्वयं उनकी परीक्षा लेने का निश्चय किया।वे परीक्षा के बहाने पार्वती जी को देखना भी चाहते थे।अतः शिव जी एक जटाधारी तपस्वी का रूप धारण कर पार्वती जी के आश्रम मे पहुँचे।पार्वती जी ने उनका यथोचित सत्कार किया और कुशल-क्षेम पूछा।तब तपस्वी रूपी शिव जी ने पार्वती जी से पूछा -- तुम कौन हो ? इस निर्जन वन मे किस प्रयोजन से कठोर तप कर रही हो ? क्या तुम किसी तपस्वी की पत्नी हो ; जो तुम्हें छोड़कर कहीं अन्यत्र चला गया है ? क्या तुम वेदमाता गायत्री ; लक्ष्मी या सरस्वती हो ? तुम जो भी हो ; अपना स्पष्ट परिचय प्रदान करो।
पार्वती जी अपना परिचय देकर बोलीं -- मै शिव जी को पति रूप मे प्राप्त करना चाहती हूँ।इसीलिए यह कठोर तप कर रही हूँ।किन्तु वे अब तक नहीं प्राप्त हो सके हैं।इसलिए मै अग्नि मे प्रवेश कर जाना चाहती थी ; तभी आप आ गये। आपका सत्कार कर चुकी हूँ।अब मै अग्नि मे प्रवेश करने जा रही हूँ।इतना कहकर पार्वती जी अग्नि मे प्रविष्ट हो गयीं।परन्तु उनके तप के प्रभाव से अग्नि चन्दन की भाँति शीतल हो गयी।पार्वती जी आकाश की ओर उठने लगीं।इतने मे तपस्वी ने हँसते हुए कहा कि तुम्हारा तप मेरी समझ मे नहीं आ रहा है।यहाँ अग्नि मे तुम्हारा शरीर नहीं जला ; इससे प्रतीत होता है कि तुम्हारी तपस्या सफल हो गयी है।किन्तु अभी तक मनोरथ पूर्ण न होना तुम्हारी तपस्या की विफलता का सूचक है।अतः तुम अपना मनोरथ स्पष्ट रूप से मुझे बतलाओ।तब पार्वती के निर्देशानुसार उनकी सखी विजया ने उनके पूर्व जन्म से लेकर आज तक का सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाया।बाद मे पार्वती जी ने भी अपने मुखारविन्द से अपना मनोरथ अभिव्यक्त किया।
इसे सुनकर तपस्वी बोले -- शिव जी के प्रति मेरी प्रगाढ़ आस्था है।मै उनको भलीभाँति जानता हूँ।वे अत्यन्त अमंगल वेषधारी एवं अभक्ष्यभक्षी हैं।उनका कुल-वंश आदि भी अज्ञात है।वे घर-गृहस्थी के भोगों से विरक्त एवं नंग-धड़ंग रहने वाले हैं।उनके पास भूत-प्रेत आदि का समूह एकत्रित रहता है।उनकी शारीरिक संरचना भी अच्छी नहीं है।उन्हें पहले दक्ष जी ने त्यागा बाद मे सती जी ने भी त्याग दिया था।तुम स्त्रीरत्न होते हुए भी ऐसे विचित्र पति की अभिलाषा क्यों करती हो ? तुम अत्यन्त रूपवती होकर एक कुरूप व्यक्ति को अपना पति बनाना चाहती हो।यह तुम्हारी घोर अज्ञानता का परिचय है।तुम्हें सुख देने के लिए उनके पास कुछ भी नहीं है।अतः तुम्हें उनके साथ अपना मन नहीं जोड़ना चाहिए।
उस तपस्वी की बातों को सुनकर पार्वती जी बहुत कुपित हुईं।उन्होंने डाँटते हुए कहा कि तुम शिव जी के विषय मे कुछ नहीं जानते हो।उनके विषय मे मुझे पर्याप्त ज्ञान है।वे कभी-कभी अपनी लीलाशक्ति से प्रेरित होकर विचित्र वेष धारण कर लेते हैं ; किन्तु सत्य तो यह है कि वे साक्षात् परब्रह्म परमात्मा हैं।उन्होंने अपनी इच्छानुसार ही शरीर धारण किया है।वे निर्गुण ब्रह्म होते हुए भी विशेष कारणवश सगुण हो गये हैं।वे समस्त विद्याओं के एकमात्र आधार ; ज्ञान के सागर ; सबके आदि कारण ; सर्वोपास्य ; अक्षय शक्तिप्रदाता एवं मृत्युञ्जय हैं।उन्हीं की कृपा से सभी देवगण देवत्व को प्राप्त हुए हैं।वे सर्वेश्वर ; कल्याणस्वरूप एवं अवढर दानी हैं।ऋद्धि-सिद्धि आदि सदैव उनकी सेवा करती हैं।फिर उन्हें किस वस्तु का अभाव होगा।
इस प्रकार पर्याप्त देर तक पार्वती जी भगवान शिव जी के माहात्म्य का वर्णन करती रहीं।तपस्वी जी चुपचाप सुनते रहे।पार्वती जी का क्रोध बढ़ता जा रहा था।उन्होंने अपनी सखी से कहा कि यह ब्राह्मण होने के कारण वध्य तो नहीं है ; किन्तु त्याज्य अवश्य है।अतः हम लोग किसी दूसरे वन मे चली चलें ; जहाँ ऐसे शिव-निन्दक का मुख न देखना पड़े।ऐसा कहकर पार्वती जी ने जैसे ही पैर उठाया ; वैसे ही भगवान शिव जी अपने साक्षात् स्वरूप मे प्रकट हो गये।उन्होंने पार्वती का हाथ पकड़कर कहा -- प्रिये ! मुझे छोड़कर कहाँ जाओगी ? अब मै तुम्हारा त्याग नहीं करूँगा।मै प्रसन्न हूँ।तुम अभीप्सित वर माँगो।अभी तक मै तुम्हारी परीक्षा ले रहा था।तुम उसमे सफल हो चुकी हो।तुम मेरी पत्नी हो और मै तुम्हारा पति हूँ।मै शीघ्र ही तुम्हें अपने साथ कैलास पर ले चलूँगा।इसे सुनकर पार्वती जी ने कहा कि यह सत्य है कि मै आपकी पत्नी हूँ और आप मेरे पति हैं।फिर भी आप मेरे पिता जी से मेरा हाथ माँगिये क्योंकि यही इस लोक की रीति है।शिव जी ने उनकी बात मान ली।बाद मे वे अन्तर्धान हो गये और पार्वती जी अपने घर चली गयीं।
Wednesday, 8 June 2016
पार्वती की परीक्षा -- डाॅ कृष्ण पाल त्रिपाठी
पार्वती जी भगवान शिव जी को वर रूप मे प्राप्त करने के लिए कठोर तप मे संलग्न थीं।उनकी तपस्या का स्तर निरन्तर उच्चात्युच्च शिखर की ओर अग्रसर था।उसे देखकर शिव जी भी आश्चर्यचकित हो गये।उन्होने पार्वती की भक्ति की दृढ़ता की परीक्षा लेने का मन बनाया।इसके लिए उन्होंने सप्तर्षियों को बुलाया और पार्वती की परीक्षा लेने की आज्ञा दी।सप्तर्षिगण शिव जी को प्रणाम कर पार्वती जी के आश्रम की ओर चल पड़े।
सातों ऋषि जब गौरी-शिखर नामक पर्वत पर पहुँचे तब उन्होंने देखा कि माता पार्वती जी तपस्या की मूर्तिमती द्वितीय सिद्धि के समान विराजमान थीं।वे अनुपम तेज से अत्यधिक प्रकाशमान थीं।सप्तर्षियों ने उन्हें मन ही मन प्रणाम किया और पूछा कि तुम किसलिए तप कर रही हो ? इसके द्वारा किस देवता और किस फल को प्राप्त करना चाहती हो ? इसे सुनकर माता जी बोलीं -- यद्यपि मुझे कहने मे तो संकोच हो रहा है फिर भी कहती हूँ।ऋषियो ! मै नारद जी के उपदेशानुसार भगवान शिव जी को पति रूप मे प्राप्त करने के लिए यह कठोर तप कर रही हूँ।मेरा मन रूपी पक्षी पंख रहित होते हुए भी आकाश मे उड़ान भर रहा है।किन्तु मुझे विश्वास है कि मेरे स्वामी करुणानिधान भगवान शिव जी मेरा मनोरथ अवश्य पूर्ण करेंगे।
पार्वती के दृढ़ निश्चय को सुनकर सप्तर्षि हँसने लगे।परन्तु उनका सम्मान करते हुए छलयुक्त मिथ्या वचन मे बोले -- देवि ! देवर्षि नारद जी व्यर्थ ही अपने आपको ज्ञानी पण्डित मानते हैं। आप उन्हें यथार्थतः जानती नहीं हैं।वे अत्यन्त क्रूर एवं छलिया हैं।उन्होंने जिनको-जिनको उपदेश दिया है ; वे सभी विनाश की ओर ही अग्रसर हुए हैं।तुम भी उनके भुलावे मे आकर दुष्कर तपस्या की भँवर मे फँस गयी हो।तुम जिन्हें वर रूप मे प्राप्त करना चाहती हो वे रुद्र जी नितान्त उदासीन ; निर्विकार ; कामारि ; निर्लज्ज एवं अमंगल वेषधारी हैं।उनके पास तो घर-द्वार भी नहीं है।उनके कुल-परिवार का भी पता नहीं है।अतः ऐसे वर को प्राप्त कर तुम कौन सा सुख पाओगी ? वे तो वही रुद्र हैं ; जिन्होंने निर्दोष सती का परित्याग कर दिया था।इसलिए हमारी बात मानो और रुद्र से विवाह करने का विचार त्यागकर भगवान विष्णु जी से विवाह कर लो।वे आपके लिए हर प्रकार से उपयुक्त वर हैं।
सप्तर्षियों की बातें सुनकर माता जी हँसती हुई बोलीं -- आप अपनी समझ से उचित ही कह रहे हैं ; किन्तु मेरी प्रतिज्ञा अटल है।नारद जी मेरे लिए गुरु सदृश हैं और गुरुजनों का वचन सदैव सत्य होता है।इसलिए मै उनके उपदेशानुसार ही तप करूँगी।जहाँ तक शिव जी की बात है ; वे तो साक्षात् ब्रह्म हैं।इसीलिए वे निर्विकार हैं।वे केवल भक्तों के लिए ही साकार रूप धारण करते हैं।मै उन्हें यथार्थ रूप से जानती हूँ।यदि वे मुझे पत्नी रूप मे स्वीकार नहीं करेंगे तो मै आजीवन कुमारी ही रहूँगी।किसी अन्य से विवाह करने का प्रश्न ही नहीं है।सूर्य चाहे पूर्व से पश्चिम दिशा मे उदय होने लगे ; अग्नि अपनी दाहकता का परित्याग कर शीतलता ग्रहण कर ले ; मेरु पर्वत अपनी अटलता त्याग दे अथवा कमल चाहे पर्वत-शिलाओं पर खिलने लगे ; फिर भी मै अपनी प्रतिज्ञा से विचलित नहीं हो सकती हूँ।इतना कहने के बाद पार्वती जी चुप हो गयीं।
इस प्रकार पार्वती जी के दृढ़ निश्चय एवं अटल शिव-भक्ति को देखकर सप्तर्षि भी उनकी जय जयकार करने लगे।वे मातेश्वरी को शुभाशीष प्रदान कर शिव जी की ओर चल पड़े।शिव जी के पास पहुँच कर उन्हें प्रणाम किया और सम्पूर्ण वृत्तान्त से अवगत कराया।इस वृत्तान्त को सुनकर शिव जी बहुत प्रसन्न हुए।बाद मे सप्तर्षियों को विदाकर स्वयं तपस्या मे संलग्न हो गये।
Tuesday, 7 June 2016
पार्वती की तपस्या -- डाॅ कृष्ण पाल त्रिपाठी
एक बार नारद जी हिमालय के घर गये और उनसे पार्वती की शिव-सेवा एवं काम-दहन का वर्णन किया।बाद मे पार्वती से मिलकर उन्हें बतलाया कि तुमने बिना तपस्या के गर्वयुक्त होकर शिव जी की सेवा की है।उसी गर्व को नष्ट करने के लिए ही शिव जी ने यह लीला की है।परन्तु वे अत्यन्त दयालु एवं भक्तवत्सल हैं।अब तुम तपयुक्त होकर चिरकाल तक उनकी आराधना करो।वे प्रसन्न होकर तुम्हें अपनी अर्धाङ्गिनी अवश्य बनायेंगे।इस प्रकार समझाकर नारद जी ने उन्हें पञ्चाक्षर शिवमंत्र ( नमः शिवाय ) जपने का उपदेश दिया।
नारद जी के चले जाने पर पार्वती ने तप करने का दृढ़ निश्चय किया।वे अपने माता-पिता की आज्ञा लेकर जया और विजया नामक सखियों के साथ तप करने के लिए गंगोत्री तीर्थ मे गयीं।वहाँ पहुँच कर उन्होंने उच्च कोटि की तपस्या आरम्भ की।वे ग्रीष्म ऋतु मे अपने चारो ओर अग्नि जलाकर बीच मे बैठकर पञ्चाक्षर मन्त्र का जप करती थीं।इसी प्रकार वर्षा ऋतु मे भीगती हुई और शीत ऋतु मे निराहार रहते हुए शीतल जल मे खड़ी होकर शिवाराधन मे संलग्न रहती थीं।उन्होंने प्रचण्ड आँधी ; कड़ाके की सर्दी मूसलाधार वर्षा और प्रचण्ड धूप का भी सेवन किया।उनका प्रथम वर्ष फलाहार करते हुए व्यतीत हुआ।दूसरे वर्ष फलाहार को त्यागकर केवल पत्ते चबाकर तप करने लगीं।कई वर्षों तक इसी प्रकार तप किया।बाद मे उन्होंने पत्ते खाना भी बन्द कर दिया।इसलिए देवताओं ने उनका नाम " अपर्णा " रख दिया।
इस प्रकार देवी ने असंख्य वर्षों तक तप करते हुए व्यतीत किया।बाद मे पूर्णतः निराहार रहने लगीं।वे अब एक पैर से खड़ी होकर पञ्चाक्षर मन्त्र का जप करने लगीं।इस प्रकार कठोर तप करते हुए तीन हजार वर्ष व्यतीत हो गये किन्तु शिव जी का दर्शन नहीं हुआ।पार्वती जी सोचने लगीं कि मै सुदीर्घ काल से तप कर रही हूँ फिर भी प्रभुवर मेरे पास नहीं आये।लेकिन उन्हें विश्वास था कि शिव जी सर्वात्मा ; सर्वदर्शी एवं सब की कामना पूर्ण करने वाले हैं।अतः मेरी ओर उनकी कृपादृष्टि अवश्य होगी।यह सोचकर पुनः तपस्या मे संलग्न हो गयीं।उन्होंने अपनी तपस्या से बड़े बड़े ऋषियों मुनियों को भी पीछे छोड़ दिया।उनकी तपस्या का स्तर निरन्तर बढ़ता जा रहा था।
एक दिन मेना सहित हिमालय जी पार्वती जी के पास गये और उन्हें समझाया कि शिव-प्राप्ति अत्यन्त दुष्कर है।अब तुम अपनी सुकोमल शरीर को पीड़ा मत दो और तपस्या छोड़कर घर वापस चलो।तब पार्वती जी ने सबको समझाया कि आप लोग चिन्ता मत करें।आशुतोष भगवान शिव जी मुझे दर्शन अवश्य देंगे।अन्तोगत्वा हिमालय आदि वापस लौट गये और पार्वती अपने तपकार्य मे संलग्न हो गयीं।अब तो उनकी तपस्या पहले की अपेक्षा और अधिक उग्र हो गयी।उनके तप से सम्पूर्ण त्रैलोक्य संतप्त हो उठा।देव ; दानव ; मानव ; ऋषि ; मुनि सभी लोग उनकी तपस्या के तेज से व्याकुल हो उठे।वे सभी विधाता के पास गये और उस संताप से बचने का उपाय पूछने लगे।ब्रह्मा जी सभी को लेकर विष्णु जी के पास गये।विष्णु जी बताया कि यह कष्ट तभी दूर होगा जब शिव जी पार्वती जी का पाणिग्रहण करेंगे।
सभी लोग शिव जी से मिलने के लिए चल पड़े।मार्ग मे पार्वती जी का आश्रम था।अतः सबने उनका दर्शन किया और उनकी उग्रात्युग्र तपस्या का अवलोकन किया।बाद मे सभी लोग शिव जी पास पहुँचे।शिव जी ने सभी का यथोचित सत्कार किया।वार्तालाप के मध्य उन्हें बतलाया गया कि इस समय तारकासुर का आतंक अपने चरम पर है।उसका वध केवल आपके पुत्र के द्वारा ही संभव है।अतः आप पार्वती जी से विवाह करने की कृपा करें ; जिससे पुत्रोत्पत्ति हो सके।शिव जी ने विवाह करने से स्पष्ट इनकार कर दिया।देवगण बारंबार विनती करने लगे किन्तु शिव जी ध्यानमग्न हो गये।तब नन्दी जी की सम्मति से सभी देवता पुनः स्तुति करने लगे।इतना ही नहीं बल्कि देवगण प्रेम से व्याकुलचित्त होकर उच्च स्वर मे रुदन करने लगे।अन्त मे भक्तवत्सल शिव जी ध्यान से विरत हुए और पार्वती से विवाह करने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।देवगण प्रसन्न होकर जय जयकार करते हुए स्वस्थान को प्रस्थान कर गये।
Monday, 6 June 2016
कामदेव का भस्म होना -- डाॅ कृष्ण पाल त्रिपाठी
प्राचीन काल मे तारकासुर नामक एक महाबली असुर की उत्पत्ति हुई।उसने समस्त देवताओं को पराजित कर इन्द्रलोक पर अधिकार कर लिया।इन्द्रादि समस्त देवता ब्रह्मा जी की शरण मे गये और अपनी व्यथा सुनाने लगे।ब्रह्मा जी ने बताया कि तारकासुर मेरे ही वरदान से इतना प्रबल हुआ है।अतः मेरे द्वारा उसका वध किया जाना उचित नहीं है।विषवृक्ष को भी लगाने के बाद उसे काटना अनुचित माना गया है।मेरे वर से वह इतना शक्तिशाली हो गया है कि त्रिदेवों मे से कोई भी उसका वध करने मे सक्षम नहीं है।
इसे सुनकर देवगण घबरा गये और उसकी मृत्यु का उपाय पूछने लगे।तब ब्रह्मा जी ने बतलाया कि शिव जी के वीर्य से कोई पुत्र उत्पन्न हो तो वही तारकासुर का वध कर सकता है।इसलिए जिन दक्षपुत्री सती ने पार्वती के रूप मे अवतार लिया है ; उनका विवाह शिव जी से कराने का उपाय कीजिए।उनके पुत्र द्वारा ही इस असुर का वध संभव है।इस समय शिव जी गंगोत्री तीर्थ मे तपस्या कर रहे हैं और पार्वती जी उनकी सेवा मे संलग्न हैं।किन्तु शिव जी ध्यानमग्न होने के कारण पार्वती जी की ओर आकृष्ट नहीं हो रहे हैं।आप लोग ऐसा प्रयास कीजिए कि शिव जी पार्वती जी को अपनी भार्या बनाने के लिए तैयार हो जायँ।
बाद मे देवताओं ने कामदेव का स्मरण किया।कामदेव तत्काल उपस्थित हो गया।इन्द्र ने उसे सम्पूर्ण कथा सुनाई और उससे सहयोग करने का निवेदन किया।उस समय कामदेव भी भगवान शिव जी की माया से मोहित हो गया।उसने सहयोग देने का आश्वासन देते हुए कहा कि मै इस कार्य को अवश्य करूँगा।इसमे रञ्चमात्र सन्देह नहीं है।इस प्रकार उसने सम्पूर्ण कार्यसिद्धि का भार अपने ऊपर ले लिया।
देवताओं को वचन देकर कामदेव वहाँ से चला गया।वह अपनी पत्नी रति और वसन्त को अपने साथ लेकर वहीं पहुँच गया ; जहाँ योगीश्वर भगवान शिव जी ध्यानमग्न थे।उसने शिव जी के ऊपर शर-सन्धान किया ; जिससे उनके मन मे पार्वती जी के प्रति आकर्षण उत्पन्न होने लगा।उनका धैर्य शिथिल पड़ने लगा और समाधि भंग होने लगी।इस स्थिति को देखकर शिव जी सोचने लगे कि मेरी तपस्या मे महाविघ्न क्यों आ रहा है ? इस समय किस कुकर्मी ने मेरे चित्त मे इस प्रकार का विकार उत्पन्न किया है ?
शिव जी चारो ओर देखने लगे।तब उन्हें वामभाग मे शर-सन्धान करते हुए कामदेव दिखाई पड़ा।वह अपनी शक्ति के अहंकार से उन्मत्त होकर दुबारा बाण छोड़ना चाहता था।उसे देखते ही शिव जी का क्रोध बढ़ने लगा।इसी बीच कामदेव ने अपना दुर्निवार अमोघास्त्र शिव जी पर छोड़ दिया।परन्तु शिव जी पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा।वह अमोघास्त्र शिव जी के पास जाकर शान्त हो गया।इसे देखकर कामदेव भयभीत हो गया।वह इन्द्रादि देवताओं का स्मरण करने लगा।इन्द्रादि सभी देवता तत्काल आ गये और शिव जी की स्तुति करने लगे।
इसी बीच भगवान हर जी के ललाट के मध्य भाग मे स्थित तृतीय नेत्र से प्रचण्ड अग्नि का प्रादुर्भाव हुआ।उसकी तीव्र ज्वालायें ऊर्ध्वगामी हो रही थीं।देखते ही देखते वह अग्नि-ज्वाला आकाश मे उछली और पृथ्वी पर गिर पड़ी।वह चारो ओर चक्कर काटते हुए कामदेव के समीप पहुँच गयी।देवगण जब तक भगवान से क्षमायाचना करते तब तक तो उसने कामदेव को भस्म कर दिया।चारो ओर हाहाकार मच गया।देवता भी भयभीत हो गये।
इस भयानक एवं शोकप्रद दृश्य को देखकर कामदेव की पत्नी रति करुण क्रन्दन करने लगी।उसके विलाप से सम्पूर्ण वातावरण शोकमय हो गया।उसने देवताओं को भी बहुत उलाहना दिया।तब भयभीत देवताओं ने काँपते हुए भगवान शिव जी की विधिवत् स्तुति की।बारंबार प्रार्थना करने पर आशुतोष जी प्रसन्न हो गये।वे बोले -- मेरे क्रोध से जो हो गया है ; वह अब अन्यथा नहीं हो सकता है।फिर भी रति का पति तभी तक अनंग रहेगा ; जब तक श्रीकृष्ण के पुत्र का अवतार नहीं हो जाता है।अतः आप लोग प्रतीक्षा कीजिए।श्रीकृष्ण और रुक्मिणी के संयोग से कामदेव का जन्म अवश्य होगा।उस समय उसका नाम प्रद्युम्न होगा।इस प्रकार शिव जी से वरदान प्राप्त कर रति भी प्रसन्न हो गयी।देवगण भी प्रसन्नता पूर्वक अपने-अपने स्थान को चले गये।
पार्वती की शिवसेवा -- डाॅ कृष्ण पाल त्रिपाठी
यह संयोग ही है की पार्वती जी को अपने विवाह के पूर्व ही शिव जी की सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।इस विषय मे एक रोचक आख्यान उपलब्ध है।एक बार नारद जी हिमालय के घर पहुँच गये।हिमालय ने उनका विधिवत् सत्कार करने के बाद अपनी पुत्री पार्वती का हाथ देखकर फलादेश करने का निवेदन किया।नारद जी ने बताया कि आपकी पुत्री समस्त शुभ लक्षणों से युक्त है।परन्तु एक रेखा बहुत विलक्षण है।उसके अनुसार इसे योगी ; निर्गुण ; निष्काम ; मातृ-पितृ विहीन एवं अमंगल वेशधारी पति प्राप्त होगा।
नारद जी की बात सुनकर हिमालय और मेना बहुत दुःखी हुए किन्तु पार्वती जी उस भावी पति को शिव जी मानकर बहुत प्रसन्न हुईं।बाद मे नारद जी ने पार्वती जी के पूर्वजन्म की घटना सुनाई तब माता-पिता भी प्रसन्न हो गये।धीरे-धीरे समय व्यतीत होता गया।एक दिन पार्वती ने अपने माता-पिता से बताया कि मैने पिछली रात्रि के ब्रह्म मुहूर्त मे एक स्वप्न देखा है ; जिसमे एक तपस्वी ने शिव जी को प्रसन्न करने के लिए मुझसे तप करने को कहा है।उसी समय हिमालय ने भी उसी भाव से मिलते जुलते स्वप्न देखने की बात बतलायी।परस्पर वार्तालाप के बाद सब लोग उस स्वप्न के फल की प्रतीक्षा करने लगे।
एक बार शिव जी गंगावतार ( गंगोत्री ) नामक तीर्थस्थल पर तपस्या करने आ गये।इसे सुनकर हिमालय जी अपनी पुत्री पार्वती सहित शिव जी के पास गये।उन्होंने शिव जी को प्रणाम कर निवेदन किया कि मेरी पुत्री आपकी सेवा करने के लिए बहुत उत्सुक है।अतः इसे सेवा करने का अवसर प्रदान करने की कृपा करें।शिव जी ने कहा -- हे शैलराज ! आपकी पुत्री अत्यन्त सुन्दर एवं शुभलक्षणा है किन्तु इसे मेरे पास नहीं लाना चाहिए।विद्वानों का कथन है कि स्त्री मायारूपिणी एवं तपस्वियों के तप मे विघ्न डालने वाली होती है।मै तो योगी ; तपस्वी और माया से निर्लिप्त रहने वाला हूँ।इसलिए युवती स्त्री से मेरा कोई प्रयोजन नहीं है।
शिव जी की बातों को सुनकर पार्वती जी बोलीं -- प्रभो ! आप ज्ञानविशारद हैं ; फिर भी ऐसी बातें कर रहे हैं।आप तो स्वयं जानते हैं कि समस्त कर्मों को करने की शक्ति को प्रकृति कहा जाता है।उस प्रकृति के बिना लिंगरूपी महेश्वर कैसे हो सकते हैं ? शिव जी ने भी इसका यथोचित उत्तर दिया।धीरे-धीरे दोनो मे शास्त्रार्थ होने लगा।पार्वती जी सांख्यशास्त्र के आश्रय से और शिव जी वेदान्तशास्त्र के आश्रय से अपना मत व्यक्त कर रहे थे।दोनो ने अपने-अपने अकाट्य तर्क प्रस्तुत किये।अन्ततोगत्वा शिव जी ने पार्वती को सेवा करने की अनुमति प्रदान कर दी।
इसके बाद पार्वती जी प्रतिदिन अपनी सखियों के साथ जाने लगीं और भक्तिपूर्वक शिव जी की सेवा मे संलग्न हो गयीं।वे प्रतिदिन शिव जी के चरणों को धोकर उस चरणामृत का पान करने लगीं।उसके बाद शिव जी को स्नान आदि कराकर अपने घर लौट जाती थीं।इस प्रकार दीर्घकाल तक वे शिव जी की सेवा करती रहीं।अब तो पार्वती जी के पास केवल एक ही काम था।प्रतिदिन शिव जी के पास आकर सेवा करना और सायंकाल अपने घर लौट जाना।इसी सेवा के परिणामस्वरूप भविष्य मे उन्हें शिव जी की धर्मपत्नी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।