Wednesday, 27 January 2016

विजया एकादशी व्रत

           विजया एकादशी व्रत फाल्गुन कृष्ण पक्ष एकादशी को किया जाता है।इसे करने से मनुष्य को सर्वत्र विजय की प्राप्ति होती है।इसीलिए इसको विजया एकादशी कहा जाता है।
कथा -----
-------       सीता-हरण के बाद श्री राम लंका पर चढ़ाई करने के लिए वानर-सेना सहित समुद्र-तट पर पहुँचे।समुद्र की विशालता को देखकर श्री राम ने लक्ष्मण से उसे पार करने का उपाय पूछा।लक्ष्मण ने बताया कि इसी द्वीप मे बकदाल्भ्य मुनि रहते हैं।वे ही समुद्र पार करने का उपाय बता सकते हैं।
           श्री राम ने मुनिवर के पास जाकर प्रणाम किया और समुद्र पार करने का उपाय पूछा।मुनि ने बताया कि आप फाल्गुन कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी का व्रत करें।इसके प्रभाव से आप ससैन्य समुद्र पार कर लेंगे और विजयी भी होंगे।श्री राम ने मुनि के निर्देशानुसार व्रत किया।बाद मे उसी व्रत के प्रभाव से रावण को मार कर सीता जी को प्राप्त किया।
विधि ----
--------     व्रती दशमी को स्नानादि करके कलश पर भगवान नारायण की सुवर्ण-प्रतिमा स्थापित करे।दूसरे दिन एकादशी को गन्धाक्षत आदि से उनका विधिवत् पूजन करे।फिर वहीं पर अखण्ड दीप जलाकर दिन भर उपवास पूर्वक भगवन्नाम-स्मरण एवं रात्रि-जागरण करे।द्वादशी को किसी जलाशय के तट पर उस कलश की पुनः पूजा करे।उसके बाद प्रतिमा सहित कलश का दान करके पारणा करे।
माहात्म्य ---
-------------    यह व्रत बहुत महत्वपूर्ण है।इसे करने से व्रती को सर्वत्र विजय की प्राप्ति होती है।अन्त मे अक्षय स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

सीताष्टमी-व्रत

           सीताष्टमी-व्रत फाल्गुन कृष्ण पक्ष अष्टमी को किया जाता है।इस दिन मध्याह्न काल मे सीता जी का जन्म हुआ था।इसीलिए इसे सीताष्टमी कहा जाता है।
कथा ---
------       निर्णयसिन्धु मे उपलब्ध कल्पतरु नामक ग्रन्थ के एक उद्धरण के अनुसार फाल्गुन कृष्ण पक्ष अष्टमी को भगवान रामचन्द्र की पत्नी सीता जी का जन्म हुआ था।उसी दिन समुद्र-तट पर श्री राम ने उपवास ( व्रत ) किया था।इसलिए इस दिन जनक-नन्दिनी सीता का पूजन अवश्य करना चाहिए ---
      फाल्गुनस्य च मासस्य कृष्णाष्टम्यां महीपते।
×       ×        ×       ×       ×           ×
       जाता दशरथेः पत्नी तस्मिन्नहनि जानकी।
      उपोषितो रघुपतिः समुद्रस्य तटे तदा ।।
      रामपत्नी च सम्पूज्या सीता जनकनन्दिनी।
            परन्तु अन्य ग्रन्थों मे जानकी जी का जन्म वैशाख शुक्ल पक्ष नवमी को माना गया है ; जिसे जानकी-नवमी कहा जाता है।
विधि ---
-------      व्रती स्नानादि से निवृत्त होकर संकल्प पूर्वक जनक-नन्दिनी सीता जी का गन्धाक्षत आदि से विधिवत् पूजन करे।उसके बाद जौ चावल आदि की खीर का हवन करे।साथ ही जानकी जी को पूए का नैवेद्य अर्पित करे।
माहात्म्य --
-------------    जगज्जननी सीता जी की जयन्ती होने के कारण इसका बहुत अधिक महत्व है।जो व्यक्ति इस दिन व्रत करता है ; उसकी समस्त कामनायें पूर्ण हो जाती हैं।

Tuesday, 26 January 2016

फाल्गुन के व्रत एवं पर्व

          इस वर्ष फाल्गुन मास दिनांक 23-02-2016 से 23-03-2016 तक है।इस मास के प्रमुख व्रत एवं पर्व इस प्रकार हैं ---
फाल्गुन कृष्ण पक्ष -
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दिनांक 25-02-2016 को
सौभाग्य व्रत
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दिनांक 26-02-2016 को
संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत
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दिनांक 02-03-2016 को
सीताष्टमी
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दिनांक 05-03-2016 को
विजया एकादशी व्रत
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दिनांक 06-03-2016 को
प्रदोष व्रत
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दिनांक 07-03-2016 को
महाशिव रात्रि व्रत
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दिनांक 08-03-2016 को
श्राद्ध की अमावस्या
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दिनांक 09-03-2016 को
स्नानदानादि की पुण्यतमा अमावस्या
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फाल्गुन शुक्ल पक्ष -----
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दिनांक 10-03-2016 को
स्वामी राम कृष्ण परमहंस जयन्ती
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दिनांक 12-03-2016 को
मधूक तृतीया व्रत
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दिनांक 13-03-2016 को
मनोरथ चतुर्थी व्रत
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दिनांक 15-03-2016 को
कामदा सप्तमी ; अर्कसप्तमी ; त्रिवर्गसप्तमी
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दिनांक 16-03-2016 को
बुधाष्टमी व्रत ; होलाष्टक आरम्भ
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दिनांक 17-03-2016 को
आनन्द नवमी व्रत
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दिनांक 19-03-2016 को
आमलकी एकादशी व्रत
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दिनांक 20-03-2016 को
प्रदोष व्रत ; मनोरथ द्वादशी ; सुकृत द्वादशी ; गोविन्द द्वादशी ; नृसिंह द्वादशी
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दिनांक 22-03-2016 को
होलिका दहन
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दिनांक 23-03-2016 को
होली रंगोत्सव ; मनोरथ पूर्णिमा ; अशोक पूर्णिमा
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माघी-पूर्णिमा

           माघ मास के शुक्ल पक्ष की अन्तिम तिथि को माघी-पूर्णिमा कहा जाता है।इसकी प्रमुख विशेषतायें इस प्रकार हैं।
1-- इस दिन सूर्य और चन्द्रमा ठीक आमने-सामने 180 अंश के अन्तर पर स्थित होते हैं।यदि सूर्य कुम्भ राशि पर होगा तो चन्द्रमा सिंह राशि पर होगा।सूर्य मकर राशि पर होगा तो चन्द्रमा कर्क राशि पर होगा।यह योग बहुत शुभ माना जाता है।
2-- चन्द्रमा जब कर्क राशि मे और सूर्य मकर राशि मे होता है; तब पुण्य योग बनता है।
3-- चन्द्रमा जब सिंह मे और सूर्य कुम्भ मे होता है ; तब चन्द्रमा सूर्य की राशि मे और सूर्य अपने पुत्र शनि की राशि मे होता है।यह भी उत्तम पुण्यकारी योग माना जाता है।
4-- पूर्णिमा को चन्द्रमा सोलहों कलाओं से परिपूर्ण होकर पूर्ण प्रकाशमान होता है।
5-- पूर्णिमा को चन्द्रमा का श्वेत भाग पृथ्वी की ओर होता है।इसलिए उस समय चन्द्रमा अपने दिव्य प्रकाश से सम्पूर्ण पृथ्वी को आलोकित करता है।साथ ही अपनी किरणों से अमृत-वर्षा करता है।
6-- अमावस्या और पूर्णिमा पर्व तिथियाँ मानी जाती हैं।माघ महीना भी बहुत पवित्र होता है।अतः धार्मिक दृष्टि से माघी पूर्णिमा का महत्व बहुत अधिक होता है।
7-- माघी-पूर्णिमा के दिन भगवान विष्णु जी गंगा जल मे निवास करते हैं।इसलिए इस दिन गंगा-स्नान का विशेष महत्व है।
8-- यदि कोई व्यक्ति पूरे माघ मास मे स्नान करने मे असमर्थ हो तो केवल माघी अमावस्या को ही स्नान कर लेने पर उसे पूरे माघ-स्नान का फल मिल जाता है।
9-- इस दिन जगज्जननी सरस्वती के दिव्य स्वरूप ललिता महाविद्या की जयन्ती भी है।इसलिए इस तिथि की महत्ता और अधिक बढ़ जाती है।
10-- सनातन परम्परा मे माघी पूर्णिमा का बहुत अधिक धार्मिक महत्व माना जाता है।यह प्रयाग के संगम स्नान के प्रमुख पर्वों मे एक है।
11-- माघी पूर्णिमा को स्नान दान जप तप पूजा पाठ आदि का असीम महत्व है।इससे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
12-- इस दिन से प्रयाग का माघ मेला समाप्त हो जाता है।साथ ही माघ मास सम्बन्धी स्नान दान व्रत यम नियम आदि का भी समापन हो जाता है।
13-- माघी पूर्णिमा को जब बृहस्पति और चन्द्रमा मघा नक्षत्र पर हों तब उसे महामाघी कहा जाता है।परन्तु अन्य स्थलों पर कहा गया है कि जब मेष राशि मे शनि ; सिंह मे गुरु और चन्द्रमा ; श्रवण नक्षत्र मे सूर्य हो तब महामाघी होती है।
14-- प्रायः सभी पुराणों मे माघी पूर्णिमा को अत्यन्त पूजित माना गया है।
15-- पूर्णिमा तिथि का स्वामी चन्द्रमा है।इसलिए उसे यह तिथि विशेष प्रिय है।अतः इस दिन चन्द्रार्घ्य प्रदान करने से चन्द्रदेव की अनुकम्पा अवश्य प्राप्त होती है।

जयाएकादशी-व्रत

           जयाएकादशी-व्रत माघ शुक्ल एकादशी को किया जाता है।
कथा ---
-------      एक बार देवराज इन्द्र ने नन्दन-वन मे संगीत का आयोजन किया।उसमे अनेक गन्धर्वों के साथ चित्रसेन की पुत्री पुष्पदन्ती तथा पुष्पदन्त के पुत्र माल्यवान् ने भी भाग लिया।ये दोनों एक दूसरे पर आसक्त थे।जब इनका गान आरम्भ हुआ तब परस्पर वशीभूत होने के कारण शुद्ध गान नही कर सके।इसे देखकर इन्द्र को क्रोध आ गया।अतः उन्होने उन दोनो को पिशाच होने का शाप दे दिया।
          वे दोनो अभिषप्त जीवन व्यतीत करते हुए हिमालय पर चले गये।संयोगवश जया एकादशी आ गयी।दोनो ने निर्जला-निराहार व्रत एवं रात्रि-जागरण किया।इसके प्रभाव से वे दोनो पिशाचत्व से मुक्त होकर अपने पूर्व रूप मे आ गये।इसके बाद वे दोनो इन्द्र के पास गये।उन्हें प्रणाम करके पिशाचत्व से मुक्त होने का सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाया।इन्द्र बहुत प्रसन्न हुए और दोनो को ससम्मान अमृत भी पिलाया।
विधि ---
------         व्रती प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर संकल्प पूर्वक भगवान विष्णु का षोडशोपचार पूजन करे।दिन भर उपवास एवं भगवन्नाम-स्मरण करता हुआ रात्रि-जागरण करे।दूसरे दिन विधिवत् पारणा करे।
माहात्म्य --
------------     जया एकादशी बहुत पवित्र ; पापनाशिनी एवं भोग-मोक्ष-प्रदायिनी है।वह ब्रह्महत्या सदृश पापों और पिशात्व को भी नष्ट कर देती है।जो व्यक्ति इसका व्रत करता है ; उसे सभी प्रकार के दान एवं यज्ञों का पुण्यफल प्राप्त हो जाता है।उसे कभी भी प्रेतयोनि मे नही जाना पड़ता है।

Monday, 25 January 2016

गणेश जी की उत्पत्ति

           गणेश जी की उत्पत्ति के विषय मे अनेक कथायें प्रचलित हैं।पिछले लेखों  --" संकष्ट-गणेश-चतुर्थी-व्रत " एवं " संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत " मे गणेशोत्पत्ति सम्बन्धी कुछ कथायें प्रस्तुत कर चुका हूँ।अब वराहपुराण के आधार पर गणेशोत्पत्ति की कथा प्रस्तुत है।कथाओं मे भिन्नता का कारण यह है कि भिन्न-भिन्न कल्पों मे उनका आविर्भाव भिन्न प्रकार से हुआ है।इसलिए सभी कथायें सत्य एवं प्रामाणिक हैं।
           प्राचीन काल मे देवताओं और ऋषियों-मुनियों के सभी कार्य निर्विघ्न सम्पन्न होते थे।किन्तु कालान्तर मे उनकी कार्य-सिद्धि मे बाधायें आने लगीं।अतः वे इस समस्या का समाधान पाने के लिए शिव जी के पास कैलास पर्वत गये।शिव जी उनकी बातें सुनकर उमा जी की ओर देखने लगे।उन्हें अचानक हँसी आ गयी।उसी समय शिव जी के मुख से एक परम तेजस्वी कुमार प्रकट हुआ।उसके मुख के तेज से सभी दिशायें प्रकाशित हो गयीं।उसमे शिव जी के सभी गुण विद्यमान थे।उमा जी उसे अपलक-दृष्टि से देखने लगीं।
          यह दृश्य देखकर शिव जी क्रुद्ध हो गये।उन्होंने कुमार को शाप दे दिया कि तुम्हारा मुख हाथी के समान और पेट लम्बा हो जायेगा।इतना कहने पर भी उनका क्रोध शान्त नहीं हुआ।उनके शरीर के रोमकूपों से जल निकलने लगा।उससे अनेक विनायकों का प्रादुर्भाव हो गया।उसी समय ब्रह्मा जी आ गये।उन्होने शिव जी से अनुरोध किया कि आप अपने मुख से प्रकट होने वाले इस कुमार को इन विनायकों का स्वामी बनाने की कृपा करें।साथ ही इन्हें समस्त विघ्न-बाधाओं का विनाश करने का सामर्थ्य भी प्रदान करें।
           शिव जी ने सभी देवताओं एवं ऋषियों-मुनियों के समक्ष उस कुमार को सभी विनायकों एवं गणों के स्वामी पद पर अभिषिक्त कर दिया।इसीलिए वे गणों के ईश अर्थात् गणेश के नाम से प्रसिद्ध हो गये।शिव जी ने उन्हें प्रथम-पूज्य ; विघ्नविनाशक एवं सर्वसिद्धि-प्रदायक होने का वरदान भी दिया।
           गणेश जी का इस प्रकार जन्म एवं अभिषेक आदि सारी क्रियायें चतुर्थी तिथि को ही सम्पन्न हुई थीं।इसीलिए इस तिथि को इतना महत्व प्राप्त हुआ है।जो व्यक्ति इस तिथि को तिलों का आहार ग्रहण करता है।गणेश जी की आराधना करता है।उस पर गणेश जी अत्यधिक प्रसन्न होते हैं।वे अपने भक्त को निष्पाप बना देते हैं।उसे जीवन मे किसी प्रकार की विघ्न-बाधा का सामना नही करना पड़ता है।

जयन्तीसप्तमी-व्रत

           जयन्तीसप्तमी-व्रत माघ शुक्ल सप्तमी को किया जाता है।इसी दिन सूर्यदेव ने सम्पूर्ण संसार को अपने प्रकाश से आलोकित करना आरम्भ किया था।इसीलिए इसे सूर्य-जयन्ती के रूप मे मनाया जाता है।
कथा --
--------        इस व्रत का वर्णन भगवान ब्रह्मा जी ने किया है।इसलिए इसकी महत्ता  बहुत अधिक है।
विधि ---
------           व्रती माघ शुक्ल पञ्चमी को एकभुक्त ; षष्ठी को नक्तव्रत और सप्तमी को उपवास पूर्वक सूर्यदेव का विधिवत् पूजन करे।अष्टमी को विधिवत् पारणा करे।
           इस व्रत को एक वर्ष तक प्रत्येक महीने के शुक्ल पक्ष मे इसी प्रकार करना चाहिए।प्रत्येक तीन महीने बाद पारणा कर अग्रिम व्रत आरम्भ करना चाहिए।चैत्र मास की पारणा मे पञ्चगव्य का प्राशन करे।इस समय सूर्य-पूजन मे अन्य उपचारों के साथ बकुल-पुष्प ; कुंकुम ; घृतधूप एवं मोदक-नैवेद्य का प्रयोग आवश्यक है।फिर " चित्रभानुः प्रीयताम् " कहे।ब्राह्मण को भी मोदक खिलाये।
          आषाढ़ की पारणा मे कमलपुष्प ; श्वेतचन्दन ; गुग्गुलधूप ; तथा गुड़ के अपूप से सूर्य-पूजन करे।इस समय " भानुः प्रीयताम् " कहे।व्रती गोमय का प्राशन करे।आश्विन की पारणा मे सूर्य को मालती-पुष्प ; लाल चन्दन ; विजयधूप एवं घृतनिर्मित अपूप समर्पित करे।इस समय " आदित्यः प्रीयताम् " कहे और कुशोदक का प्राशन करे।पौष की पारणा मे रक्तकनेर के पुष्प ; रक्तचन्दन ; अमृत धूप एवं पायस-नैवेद्य द्वारा सूर्य-पूजन कर " भास्करः प्रीयताम् " कहे।स्वयं श्वेतगौ के मट्ठे का प्राशन करे।
माहात्म्य ---
------------      इस व्रत को करने से मनुष्य की समस्त कामनायें पूर्ण हो जाती हैं।पुत्रार्थी को पुत्र ; धनार्थी को धन और रोगी को आरोग्य की प्राप्ति होती है।व्रती सर्वत्र विजय प्राप्त करता है।वह समस्त पापों से मुक्त होकर अन्त मे सूर्यलोक को प्राप्त करता है।